हरियाणा में 1857 की क्रांति (1857 Revolt in Haryana)
1803 ई. से 1856 ई. तक अंग्रेजों की प्रशासनिक, सामाजिक, धार्मिक शोषण व्यवस्था से लोगो में असंतोष पैदा हुआ। क्रांति के हरियाणा में प्रमुख केंद्र अम्बाला, गुड़ग्राम, रेवाड़ी, हांसी, हिसार, करनाल, रोहतक, रोहनात गाँव (भिवानी), सिरसा, पानीपत, कुरुक्षेत्र और बल्लभगढ़ आदि स्थानों के लोगों ने बढ़ चढ़ के भाग लिया। रोहतक में 159 व गुड़गाँव में 228 क्रांतिकारियों को फाँसी दी गई थी।
हरियाणा के केन्द्र क्रांतिकारियों के नाम
क्रांति में भाग लेने वाले वीर व्यक्ति –
| स्थान | क्रांतिकारी का नाम |
|---|---|
| झज्जर | नवाब अब्दुर्रहमान खान |
| फर्रखनगर | नवाब अहमद अली |
| झाड़सा परगना | चौधरी बख्तावर सिंह |
| हांसी | लाला हुकमचंद जैन/मीर बेगम |
| बल्लभगढ़ | राजा नाहर सिंह |
| दुजाना | हसन अली |
| रानियां | नूर समद खां |
| रोहतक | बिरासत खां |
| हिसार | मोहम्मद आजम |
| रेवाड़ी | राव तुलाराम/गोपाल देव |
अम्बाला में क्रांति
कहा जाता है की, मेरठ में क्रांति की ज्वाला भड़कने से नौ घंटे पहले अम्बाला में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया था। अम्बाला फौज में 60वीं भारतीय स्थल सेना व 5वीं देशी पलटन थी।
अम्बाला में क्रांति का विफल होने का प्रमुख कारण शामसिंह नामक सिपाई था शामसिंह ने क्रांति से पहले ही अंग्रेजों को सूचना दे दी इस प्रकार अंग्रेजों ने अम्बाला में क्रांति को दबा दिया।
गुड़गाँव एवं बल्लभगढ़ में क्रांति
13 मई को 300 सैनिक गुड़गाँव पर आक्रमण करने के लिए बढ़ चले। गुड़गाँव के कलैक्टर-मैजिस्ट्रेट फोर्ड ने इन क्रांतिकारियों को रोकने का असफल प्रयास किया। 14 मई को क्रांतिकारियों ने गुड़गाँव के कलैक्टर-मैजिस्टेट फोर्ड के ऑफिस पर आक्रमण कर दिया। फोर्ड गुड़गाँव छोड़कर भोंडसी होते हुए मथुरा की तरफ भाग गया। क्रांतिकारियों को वहाँ के खजाने से 78 लाख रुपये हाथ लगे।
गुड़गाँव के पास स्थित बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह ने क्रांति में बढ़-चढ़कर भाग लिया परन्तु धोखे से अंग्रेजों ने संधि के बहाने उन्हें गिरफ्तार करके 9 जनवरी 1858 ई. को फाँसी दे दी।
राजा नाहर सिंह को 1857 ई. की क्रांति में भाग लेने पर दिल्ली की चांदनी चौक पर सरेआम फाँसी पर लटका दिया गया। राजा नाहर सिंह का जन्म 6 अप्रैल 1823 को बल्लभगढ़ में राजा बहादुर सिंह (पिता) के घर हुआ था राजा नाहर सिंह के पूर्वज तेवतिया गौत्र के जाट थे। वर्तमान में बल्लभगढ़ मेट्रो स्टेशन का नाम राजा नाहर सिंह के नाम पर रखा गया है। बल्लभगढ़ के पहले राजा बलराम सिंह तेवतिया थे।
राजा नाहर सिंह के नाम से बल्लभगढ़ में नाहर सिंह स्टेडियम की स्थापना 1981 में क्रिकेट स्टेडियम के रूप में की गई थी।
हांसी में क्रांति
हांसी की क्रांति 14-15 मई को शुरू हुई थी। हांसी क्षेत्र में रांघड नौजवान सैनिक थे। पुड़ी गाँव के मंगल खान व उसके सहयोगी कैदे खाँ ने सबसे पहले बगावत का बिगुल बजाया। इस क्षेत्र के लिए अंग्रेजों ने हरियाणा लाइट इन्फेंट्री की 2 टुकड़ी (चौथी इरेग्युलर और दादरी केवलरी) तेनात की थी।
हांसी के आसपास के गाँव जमालपुर, हाजिमपुर, भाटल, अलीपुर और मंगाली के क्रांतिकारियों को हांसी लाकर मुख्य बाजार में पत्थर की गिरड़ी के नीचे कुचलवा दिया गया था। जिस कारण यह सड़क आज भी लाल सड़क के नाम से जानी जाती है।
रोहनात में क्रांति
गाँव रोहनात हांसी से आठ मील दक्षिण की ओर वर्तमान भिवानी जिले में आबाद गावं है। अंग्रेज सैनिकों ने 800 घुड़सवार व 4 तोपें लेकर तोशाम पर हमला किया और उसके बाद रोहनात गाँव पर अंग्रेजी सेना व बीकानेर के सैनिकों ने जबरदस्त हमला किया। जिसका गाँव के देशभक्त क्रांतिकारियों ने जेली, बल्लम, गंडासों आदि हथियारों से डटकर मुकाबला किया। ‘मंगल खां’ व ‘बिरड़ दास बैरागी’ को तोप से उड़ा दिया गया व ‘रूपा खाती’ को मार डाला गया। अन्य साथियों को हांसी ले जाकर पत्थर की गिरड़ी के नीचे कुचल दिया गया।
हिसार में क्रांति
हांसी में विद्रोह की ज्वाला सुलगने के तीन घंटे बाद हिसार जिले के मुख्यालय में भी विद्रोह भड़क उठा तब हिसार जिले के जिलाधीश डिप्टी कमिश्रर मि. बेडबर्न को उनके परिवार सहित कत्ल कर दिया गया। हाजमपुर, जमालपुर, भाटोल रांगड़ान आदि गाँव के लोगों ने अपने स्वदेशी हथियारों के साथ हमला किया और किले में 11 अंग्रेज अफसरों को मार डाला।
सिरसा में क्रांति
रानियां का भट्टी नवाब नूर समद खां ने अपने चाचा गुलाम अली खां के साथ 4000 भट्टी सैनिकों को लेकर सिरसा पर कब्जा कर लिया व अपने आपको गवर्नर घोषित कर दिया। भट्टी नवाब नूर समद खां रानियां का कुल 3 सप्ताह तक सिरसा पर अधिकार रहा। चीफ कमिश्रर सर जॉन लॉरेंस के आदेश पर 8 जून, 1857 ई. को फिरोजपुर के डिप्टी कमिश्रर जनरल वान कोर्टलैंड ने 550 गौरे फौजी व दो तोपों के साथ इस क्षेत्र पर पुनः कब्जा करने के लिए कूच किया था।
रेवाड़ी में क्रांति
अंग्रेज शावर्स के रेवाड़ी पहुंचने से पहले ही राव तुलाराम ने 5 अक्टूबर, 1857 ई. को फिरोजपुर के डिप्टी कमिश्र किला खाली कर दिया।
ब्रिगेडियर जनरल शावर्स के आक्रमण के समय रेवाड़ी के राव तुलाराम, उसके चाचा राव किशन सिंह व भाई राव गोपाल देव, झज्जर के जनरल अब्दुल समद खान और भट्टू कलां के मोहम्मद आजम सुरक्षित स्थानों की तरफ चले गये थे।
कप्तान हडसन राव तुला राम की तैयारी से बड़ा ही आश्चर्य चकित हुआ। राव तुला राम का जन्म 9 दिसम्बर 1825 रामपुरा रेवाड़ी में हुआ था इनके पिता जी राव पूरन सिंह और माता जी रानी ज्ञान कौर थी। राव तुला राम सहायता के लिए विदेश जाने का प्रयास किया परन्तु अफगानिस्तान तक ही पहुंच पाए और काबुल में 23 सितम्बर 1863 ई. को उनका देहांत हो गया। इनके बलिदान के कारण ही रेवाड़ी को ‘वीरभूमि’ भी कहा जाता है। 1857 ई. की क्रांति में सबसे महत्वपूर्ण योगदान देने पर भारत सरकार द्वारा इनकी स्मृति में दिनांक 23 सितम्बर 2001 को डाक टिकट जारी किया गया। वीर पुरुष राव बहादुर तुलाराम जी 1857 की क्रांति के प्रमुख नेता थे। 1857 की क्रांति में हरियाणा का हीरो राव तुलाराम को कहते है इन्होंने 1838 से 1857 तक राज पाट संभाला।
हर वर्ष 23 सितम्बर को हरियाणा में शहीद दिवस बनाया जाता। राव तुला राम स्टेडियम रेवाड़ी में है। राव तुला राम चौक झज्जर में है। राव तुला राम के दादा जी राव तेज सिंह ने रेवाड़ी में एक तालाब (राव तेज़ सिंह तालाब) बनवाया है रेवाड़ी में राव तेज सिंह ने 1801 में रामपुरा महल बनाया था।
नसीबपुर की क्रांति
नसीबपुर में राव तुलाराम की सेना का नेतृत्व राव किशन सिंह कर रहे थे, जिनके साथ उनके छोटे भाई राव रामलाल भी थे। यह क्रांति 16 नवम्बर 1857 को नारनौल के समीप नसीबपुर में हुई थी। अंग्रेज जेरार्ड इस क्रांति में मार दिया गया। परंतु साथ-साथ राव किशन सिंह भी वीरगति को प्राप्त हुए। आज भी कवाली गाँव में उनकी याद में जय बाबा राव जी की छतरी बनी हुई है।
नोट – 1857 ई. की क्रांति में हरियाणा के शहीदी स्मारक नसीबपुर (नारनौल)।
दिल्ली
दिल्ली पर अधिकार होने के बाद भारतीय सैनिकों ने गुड़गाँव के कलेक्टर फोर्ड को खदेड़कर गुड़गाँव पर अधिकार कर लिया। राव तुलाराम ने रेवाड़ी में, लाला हुकमचन्द जैन ने हाँसी में मुहम्मद शहजादा आजिम ने हिसार में, नूरसमदखान ने रानियां में, अबुर्दरहमान एवं उसके दामाद समदखान ने झज्जर में, बाबा शाहमल तोमर ने बड़ौत (मेरठ) में एवं राजा नाहर सिंह ने बल्लभगढ़ में क्रान्ति का बिगुल बजाया।
सितम्बर 1857 ई. में अंग्रेजों ने कड़े संघर्ष के बाद दिल्ली पर पुनः अधिकार किया। और बहादुरशाह जफ़र को हुमायूं के मकबरे से बन्दी बनाकर रंगून भेज दिया गया, जहां पर 1863 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
(स्रोत HBSE – 8वीं कक्षा हरियाणा का इतिहास)
