हरियाणा का इतिहास (History of Haryana) — संपूर्ण नोट्स
प्राचीन स्रोत, हड़प्पा स्थल, महाभारत काल, गणराज्य, वर्धन-प्रतिहार-तोमर-चौहान वंश, दिल्ली सल्तनत, मुगल काल, 1857 की क्रांति, राष्ट्रीय आन्दोलन और हरियाणा राज्य का गठन — HSSC CET, Group D, Police, Patwari व अन्य हरियाणा परीक्षाओं के लिए पूर्ण अध्याय। साथ में हरियाणा सामान्य परिचय भी पढ़ें।
- प्राचीन हरियाणा के स्रोत
- हरियाणा में हड़प्पा स्थल
- महाभारत काल
- हरियाणा में गणराज्य
- वर्धन वंश
- गुर्जर प्रतिहार, तोमर और चौहान वंश
- गुलाम वंश
- खिलजी, तुगलक, लोदी वंश
- मुगल वंश
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन
- हरियाणा में 1857 की क्रांति
- राष्ट्रीय आन्दोलन में हरियाणा की भूमिका
- हरियाणा राज्य का गठन
- जिलों का नामकरण और उपनाम
- गाँव के बदले गए नाम
- हरियाणा के राजकीय प्रतीक
- हरियाणा की जनगणना
प्राचीन हरियाणा के स्रोत
हरियाणा एक प्राचीन नाम है। प्राचीन समय में इस क्षेत्र को ब्रह्मवर्त, आर्यवर्त और ब्रह्म प्रदेश के नाम से जाना जाता था। महाभारत काल में हरियाणा को बहुत ज्यादा अनाज होने के कारण बहुधान्यक कहते थे।
- रोहतक जिले के बोहर गाँव से मिले शिलालेख के अनुसार, इस क्षेत्र को हरियंक के नाम से जाना जाता था। 1337 विक्रम सम्वत की अवधि के शिलालेख प्राप्त हुए हैं जिसमें ‘हरियाणा’ शब्द अंकित है।
- धरणीधर अपने काव्य ‘अखण्ड प्रकाश’ में कहते हैं कि हरियाणा शब्द ‘हरिबंका’ से आता है, जो हरि की पूजा व भगवान इंद्र से जुड़ा हुआ है।
- संस्कृत में रचित ग्रन्थ अष्टाध्यायी, महाभाष्य, हर्षचरितम और राजतरंगिणी आदि में हरियाणा की ऐतिहासिक जानकारी मिलती है।
विद्वानों द्वारा हरियाणा को दिए गए विभिन्न नाम
| विद्वान | दिया गया नाम |
|---|---|
| डॉ. एच.आर. गुप्ता | आर्याना (आर्यों का घर) |
| यदुनाथ सरकार | हरियाल |
| महाराज कृष्ण | हरना (लूटपाट) |
| राहुल सांकृत्यायन | हरिधान्वया |
| डॉ. बुद्ध प्रकाश | अभिरयाणा |
हरियाणा के इतिहास के स्रोत
- ऋग्वेद — हरियाणा प्रदेश का वर्णन ऋग्वेद में ‘रज हरियाणे’ के रूप में मिलता है। ऋग्वेद में हरियाणा के थानेसर और सरस्वती नदी का भी वर्णन मिलता है। ऋग्वेद से पता चलता है कि आर्य लोग सरस्वती और दृषद्वती नदी के बीच निवास करते थे। ऋग्वेद में भरत नामक कबीले का उल्लेख किया गया है, जो इस काल में सरस्वती और यमुना के बीच रहता था।
- वामन पुराण — हरियाणा को कुरु जंगल कहते थे और ब्रह्मसरोवर झील का वर्णन मिलता है। कहा गया है कि राजा कुरु ने कुरुक्षेत्र स्थल में भगवान शिव के नंदी द्वारा खींचे गए (सुनहरे भूरे रंग के हल द्वारा) सात कोस के क्षेत्र को पुनः कृषि योग्य बनाया।
- पाणिनि की अष्टाध्यायी — हरियाणा के अनेक क्षेत्रों का वर्णन मिलता है, जैसे — सैरिसक (सिरसा), कपिस्थल (कैथल), कालकूट (कालका), ताशायल (टोहाना) और श्रहण (सुहण) आदि।
- बाण भट्ट की हर्षचरित — हरियाणा को श्री कंठ जनपद कहा है और थानेसर को स्थानेश्वर के नाम से जाना जाता था।
- जैन साहित्य — रामदेव के यशस्तिलक चंपू और पुष्प दांत के जसहर चरिऊ ग्रंथों से जानकारी मिलती है कि हरियाणा पशुधन में परिपूर्ण था, चारों ओर लहराती फसलें और वर्ण आश्रम धर्म को मानने वाले लोग रहते थे। जैन मूर्तियाँ रानीला (दादरी) और हांसी से प्राप्त हुई हैं।
- दिव्यदान (बौद्ध साहित्य ग्रन्थ) — इसमें हरियाणा के रोहतक और अग्रोहा का उल्लेख मिलता है।
- मज्झिमनिकाय ग्रन्थ — इस बौद्ध ग्रंथ से हरियाणा के जन-जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।
- चुल्लवग्ग — इससे पता चलता है कि अग्रोहा बौद्ध धर्म का एक शक्तिशाली केंद्र था।
- मंजू श्री मुल कल्प — इस ग्रंथ में श्रीकण्ठ जनपद के अंतर्गत आने वाले स्थान स्थानेश्वर का उल्लेख है, और यहाँ के शासक वैश्य थे।
- टोपरा अभिलेख — अम्बाला से प्राप्त हुआ; इससे ज्ञात होता है कि हरियाणा कभी मौर्य साम्राज्य का भाग था। यही अभिलेख फिरोजशाह तुगलक दिल्ली ले गया था। वर्तमान में टोपरा नामक स्थान यमुनानगर जिले में है। 11वीं शताब्दी के चौहान राजा विग्रहराज चतुर्थ के तीन अभिलेख भी टोपरा के स्तंभ पर अंकित हैं, जिनसे मलेच्छों पर विग्रहराज IV की विजय की जानकारी मिलती है। नोट — टोपरा से सात स्तम्भ लेख प्राप्त हुए (स्रोत HBSE – 6ठी कक्षा हरियाणा का इतिहास)।
- प्रतिहार काल अभिलेख — राजा भोजराज के काल में पेहवा व सिरसा के अभिलेख मिले हैं। पेहवा के अभिलेख से ज्ञात होता है कि पेहवा घोड़ों का व्यापारिक केंद्र था, और सिरसा से पता चलता है कि यहाँ पाशुपत सम्प्रदाय था। एक अभिलेख पेहवा से महेंद्र पाल के समय का मिला है जिसमें मंदिर-निर्माण का वर्णन है।
- दिल्ली अभिलेख (पालम व दिल्ली अभिलेख) — 1328 ई. में हरियाणा को “धरती का स्वर्ग” कहा गया है; दिल्ली को ढिल्लिका बताया गया है।
- कुषाण सिक्के — हरियाणा में कुषाणों के शासन का पता खोखराकोट (रोहतक) और नौरंगाबाद (भिवानी) के सिक्कों से लगता है।
- सोनीपत का ताम्रपत्र लेख — इससे पता चलता है कि हर्ष शैव धर्म को मानने वाला था।
- राजतरंगिणी — कल्हण की इस पुस्तक में रोहतक को एक व्यापारिक स्थल बताया गया है।
- विदेशी स्रोत — ह्वेनसांग ने हरियाणा के तीन स्थानों — थानेसर, सुघ और गोकंठ (गोहाना) — का भ्रमण किया।
हरियाणा से प्राप्त महत्वपूर्ण अभिलेख
- अग्रोहा से प्राप्त अभिलेख में संगीत के सातों स्वरों का अंकन है। पशुपति सम्प्रदाय से संबंधित अभिलेख सिरसा से मिले हैं।
- लाडूनी अभिलेख नागौर (राजस्थान) से प्राप्त है; इसके अनुसार हरियाणा राज्य की राजधानी दिल्ली थी।
- कपालमोचन (यमुनानगर) से एक अधूरा अभिलेख मिला है।
- हिसार के गुर्जरी महल के एक स्तंभ पर 8 अभिलेख हैं, जो 8 जगह से आने वाले भागवतों की सूचना देते हैं।
- 2-4 सदी के तोशाम (भिवानी) से दो अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
- अग्रोहा से प्राप्त एक अभिलेख में यौधेय गण की प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है। पृथ्वीराज-3 का अभिलेख हांसी से प्राप्त हुआ है।
- राजा हर्ष काल के सोनीपत से ताम्र सिक्के प्राप्त हुए हैं।
- बौद्ध धर्म का प्रमुख केन्द्र सुघ (जगाधरी) था। बारहखड़ी लिखाई का सबसे प्राचीन अभिलेख सुघ से ही मिला है। बैलगाड़ी में बैठे संगीतकारों की मूर्ति भी सुघ से मिली है।
- इंडो-ग्रीक सिक्के और यौधेय कालीन साँचे रोहतक के खोखराकोट से प्राप्त हुए हैं।
- यक्ष-यक्षणी की मूर्तियाँ होडल, भादस, पलवल से प्राप्त हुई हैं। मिट्टी की मोहरें दौलतपुर से प्राप्त हुई हैं।
- मौर्यकालीन स्तूप व अवशेष हिसार व फतेहाबाद में मिले हैं। टकसालें बोहर माजरा, अग्रोहा व बरवाला में मिली हैं।
- यौधेय गणराज्य की मोहर भिवानी के नौरंगाबाद से प्राप्त हुई है। कुषाणकालीन सोने व ताम्बे के सिक्के और समुद्रगुप्तकालीन सिक्के भिवानी के मिताथल और जगाधरी से प्राप्त हुए हैं।
- सिक्के ढालने के साँचे खोखराकोट, बोहर माजरा और औरंगाबाद से प्राप्त हुए हैं। महात्मा बुद्ध की 2 सम्पूर्ण मूर्तियाँ नौरंगाबाद (भिवानी) से प्राप्त हुई हैं।
- सूर्य स्तंभ पर बनी मूर्ति अमीन गाँव से प्राप्त हुई है। पंचमुखी शिव मूर्ति पेहवा से प्राप्त हुई है। अस्थल बोहर (रोहतक) से बलराम की मूर्ति प्राप्त हुई है।
- नचारखेड़ा (हिसार) से रामायण श्लोकांकित फलक, और दौलतपुर (कुरुक्षेत्र) से मिट्टी की मोहरें प्राप्त हुई हैं।
हरियाणा में हड़प्पा स्थल
राखीगढ़ी (हांसी)
- राखीगढ़ी हरियाणा के हांसी जिले में स्थित है। यह राखी खास और राखी शाहपुर — 2 गाँवों में फैली हड़प्पा/सरस्वती-सिन्धु सभ्यता है। यह सरस्वती की सहायक नदी दृषद्वती (जिसे आज चौटांग कहते हैं) के पास बसी सभ्यता थी।
- राखीगढ़ी भारतीय क्षेत्रों में धोलावीरा के बाद दूसरा विशालतम नगर है। इस स्थल की खोज वर्ष 1963 में हुई; पहली बार उत्खनन का कार्य 1969 में सूरजभान द्वारा किया गया।
- राखीगढ़ी का व्यापक उत्खनन 1997-98 और 1999-2000 ई. के दौरान अमरेन्द्र नाथ ने किया। यहाँ से प्राक्-हड़प्पा एवं परिपक्व हड़प्पा युग के प्रमाण मिले हैं।
- यहाँ से एक नर कंकाल मिला है, जिसके सर व पैरों के पास मिट्टी के बर्तन मिले हैं — कंकाल लगभग 5000 से 7000 साल पुराना है। यहाँ से भारी मात्रा में मिट्टी की चूड़ियाँ मिली हैं। स्थल लगभग 350 हेक्टेयर में फैला है; खुदाई में पत्थर व लोहे के हथियार भी मिले हैं।
- राखीगढ़ी की खुदाई में तरह-तरह की आकृति के मिट्टी के खिलौने मिले हैं। 2012 की रिपोर्ट के अनुसार यह ‘खतरे में एशिया के विरासत 10 स्थल’ में शामिल किया गया। 2022 में यहाँ से एक नवजात शिशु का कंकाल और आभूषण की फैक्ट्री मिली है।
कुणाल (फतेहाबाद)
- यह स्थल वैदिक काल की सरस्वती नदी के पास स्थित है। कुणाल की खुदाई में प्री-हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं, जो लगभग 6000 साल पुराने हैं — यह अब तक की सबसे पुरानी सभ्यता हो सकती है।
- खुदाई हरियाणा सरकार के पुरातत्व व संग्रहालय विभाग के श्री जे.एस. खत्री और श्री एम. आचार्य ने की; 1985 में कुणाल की खुदाई का काम शुरू हुआ।
- कुणाल से दो मुकुट, हथियार, चूड़ियाँ और चांदी के हार, 6 सोने के मोती और अर्ध-कीमती पत्थरों के 12,000 से अधिक सूक्ष्म मोती मिले हैं। यहाँ 24 कैरेट सोने के हार व चांदी के मुकुट भी मिले हैं। आभूषण पिघलाने की भट्टी भी मिली है — इससे स्पष्ट है कि आभूषण ढालने का काम किसी भट्ठी द्वारा होता था। खुदाई में आभूषण, चूड़ियाँ, मणके व गोलाकार घर भी मिले हैं।
भिरडाना (फतेहाबाद)
- यह सिंधु घाटी सभ्यता का अब तक खोजा गया सबसे प्राचीन स्थल है। 2003-04 के उत्खनन में इस नगर की खोज हुई।
- भिरडाना से नृत्यकी की नक़ल जो बर्तन पर उकेरी हुई मिली है — इससे पहले मोहनजोदड़ो से एक नर्तकी की कांस्य मूर्ति प्राप्त हुई थी।
बनावली (फतेहाबाद)
- बनावली की खोज रविन्द्र सिंह बिष्ट द्वारा सन 1973-74 में की गई थी। यहाँ से मिट्टी के हल मिले हैं — एस-आकार के जार, खाना पकाने के बर्तन, ओवन, तंदूर, चित्रित मिट्टी के बर्तन आदि। चित्रित रूपांकनों में शामिल हैं — मोर, पीपल के पत्ते, पेड़, हिरण, तारा, मछली, फूल, चौराहे, चेकर बोर्ड पैटर्न, शहद कंघी पैटर्न।
- यहाँ की हड़प्पा मुहरों में गैंडे, जंगली बकरी, बाघ के शरीर वाले मिश्रित जानवरों के चित्र मिलते हैं। यहाँ के मिट्टी के बर्तन हड़प्पा के बर्तनों से तुलनीय हैं और इनका संयोजन कालीबंगा के संयोजन के समान है।
मिताथल (भिवानी)
- मिताथल की खुदाई सूरजभान द्वारा सन 1968-73 और 1980-86 के बीच की गई थी। यहाँ से पूर्व-हड़प्पा और हड़प्पा संस्कृति का सबूत मिला है; इसे स्वर्गीय सीसवाल सभ्यता भी कहते हैं और हड़प्पा सभ्यता का पूर्वी डोमेन कहा जाता है।
- नौरंगाबाद गाँव के पास 2001 की प्रारंभिक खुदाई में सिक्कों, उपकरणों, खिलौनों, मूर्तियों और बर्तनों से 2,500 साल पुरानी कलाकृतियों का पता चला।
भगवानपुर (कुरुक्षेत्र)
यह सरस्वती नदी के पास बसा हड़प्पा सभ्यता का स्थल है। इसकी खुदाई सन 1975-76 में J.P. जोशी ने की थी। खोज में कूबड़ वाले बैल के आकार का कोरेलियन लटकन, टेराकोटा मोती और अर्ध-कीमती पत्थर शामिल हैं।
सांपला (रोहतक)
सांपला में वर्ष 2021 की खुदाई के दौरान हड़प्पा कालीन मानव कंकाल के अवशेष मिले। पुरातत्व विभाग के अनुसार यह कंकाल करीब 3500 साल पुराना है और किसी महिला का है। कंकाल के साथ मिले अवशेष हड़प्पा सभ्यता के समय के हैं।
फरमाणा खास (दक्ष-खेड़ा, रोहतक)
हरियाणा के ज्ञात पुरास्थलों में राखीगढ़ी के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा पुरास्थल है। यहाँ सेलखेड़ी से बनी चार हड़प्पा कालीन मोहरें भी प्राप्त हुई हैं। यहाँ हड़प्पा सभ्यता कालीन कब्रिस्तान भी मिला है।
गिरावड़ (रोहतक)
इस स्थान की खोज 2006 में दयानंद विश्वविद्यालय के विवेक डांगी ने की थी। उत्खनन में यहाँ से 13 गर्त निवास प्राप्त हुए; मृदभांड पकाने के लिए दो भट्टियाँ भी प्राप्त हुई हैं।
बालू (कैथल)
इस स्थल की खोज 1977 में डॉ. सूरजभान तथा डॉ. जिम जे. शेफर (अमेरिका) ने की थी; उत्खनन डॉ. उदयवीर सिंह तथा डॉ. सूरजभान ने 1979 में किया। यहाँ से प्रारंभिक हड़प्पा, हड़प्पा और उत्तर-हड़प्पा संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं, साथ ही लहसुन के अवशेष भी मिले हैं।
मदीना (रोहतक)
इसका उत्खनन सन 2007-2008 में डॉ. मनमोहन कुमार के नेतृत्व में हुआ। इसमें भगवानपुरा की तरह उत्तराखंड हड़प्पा संस्कृति तथा चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के लोगों के साथ-साथ रहने के प्रमाण मिले हैं।
सीसवाल (हिसार)
इसकी खुदाई पंजाब विश्वविद्यालय के डॉ. सूरजभान द्वारा सन 1967 में की गई थी। मिट्टी के बर्तन व ठिकरे अधिक मात्रा में मिले हैं, जिनमें से काफी हाथ से बने हैं — ये कालीबंगा (राजस्थान) की सामग्री से मिलते-जुलते हैं। यहाँ से मिट्टी की चित्रित चूड़ियाँ, मनके तथा तांबे के हत्थे वाले गंडासे की आकृति की एक वस्तु भी प्राप्त हुई है। खेतड़ी (राजस्थान) की तांबे की खानों की समीपता के कारण यहाँ तांबे का प्रयोग होने लगा था।
महाभारत काल
रोमिला थापर के अनुसार महाभारत का युद्ध 900 ईसवी पूर्व लड़ा गया था। हरियाणा को महाभारत में बहुधान्यक के रूप में उल्लेख किया गया है — जिसका अर्थ है भरपूर मात्रा में अनाज और प्रचुर धन की भूमि।
- महाभारत के द्रोण पर्व में यौधेय गणराज्य का उल्लेख मिलता है। प्रसिद्ध नकुल दिग्विजय में राज्य के तीन दुर्गों का वर्णन किया गया है।
- पांडवों ने युद्ध में सफल होने के लिए जयंती देवी मंदिर का निर्माण करवाया था (जयंती देवी पांडवों की कुल देवी मानी जाती हैं)। पांडवों ने अपने पूर्वजों का पिंडदान पांडु पिंडारा (जींद) में किया था।
- ब्रह्म सरोवर वह स्थान माना जाता है जहाँ दुर्योधन युद्ध के समय पानी में छुपा था।
- महाभारत का मूल नाम जय संहिता था — यह नाम वेद व्यास ने रखा था। शुरुआत में इसमें केवल 8,800 श्लोक थे; बाद में कई कहानियाँ जुड़ने से श्लोकों की संख्या बढ़ाकर 100,000 कर दी गई।
- गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता को हिन्दू धर्म का पवित्र ग्रंथ माना जाता है; इसमें आत्मा, परमात्मा, भक्ति, कर्म, जीवन आदि का वर्णन है। गीता का दूसरा नाम गीतोपनिषद है।
पांडवों द्वारा स्थापित पांच प्रस्थ
| प्रस्थ | वर्तमान नाम |
|---|---|
| पांडुप्रस्थ | पानीपत |
| सोनप्रस्थ | सोनीपत |
| इंद्रप्रस्थ | दिल्ली |
| बाग्प्रस्थ | उत्तर प्रदेश में |
| तिलप्रस्थ | फरीदाबाद |
महाभारत के 18 पर्वों का संक्षिप्त विवरण
- आदि पर्व — पांडव और कौरवों के पालन-पोषण का जिक्र।
- सभा पर्व — कौरवों-पांडवों के बीच हुए पासे के खेल का विस्तृत वर्णन।
- वन पर्व — पाँचों पांडव व द्रौपदी का कामाक्ष अरण्य की ओर प्रस्थान और वहाँ बिताए समय का वर्णन।
- विराट पर्व — पांडवों को 13 वर्ष तक पत्नी द्रौपदी सहित अपनी पहचान छुपाकर रहना पड़ा।
- उद्योग पर्व — 13 वर्षों बाद पांडव हस्तिनापुर लौटे और अधिकार मांगा, दुर्योधन ने मना कर दिया — इसी का विस्तृत वर्णन।
- भीष्म पर्व — इसी पर्व में प्रसिद्ध गीता का उपदेश है; भीष्म ने कौरवों की ओर से सेनापति के रूप में कमान संभाली (युद्ध के दसवें दिन भीष्म तीरों की शय्या पर लेटे)।
- द्रोण पर्व — भीष्म के बाद गुरु द्रोण ने युद्ध की कमान संभाली।
- कर्ण पर्व — गुरु द्रोण के बाद कर्ण ने कमान संभाली; 17वें दिन कर्ण की मृत्यु हुई।
- शल्य पर्व — कर्ण के बाद शल्य ने युद्ध की कमान संभाली।
- सौप्तिक पर्व — हारने के बाद द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने प्रतिशोध हेतु पांडवों को मारना चाहा, पर उनकी जगह पांडवों के पुत्रों की मृत्यु हुई।
- स्त्री पर्व — युद्ध में पति खो चुकी स्त्रियों की आत्मा-शांति की कामना पांडवों ने की।
- शांति पर्व — राजा बनने के बाद युधिष्ठिर के मन की अशांति; भीष्म पितामह ने मार्गदर्शन किया।
- अनुशासन पर्व — भीष्म पितामह के अन्य उपदेश।
- अश्वमेध पर्व — युधिष्ठिर द्वारा अश्वमेध यज्ञ का वर्णन।
- आश्रमवासिक पर्व — धृतराष्ट्र व गांधारी का कुंती के साथ वन की ओर प्रस्थान।
- मौसल पर्व — श्राप के कारण यादव वंश का नाश।
- महाप्रस्तानिका पर्व — श्रीकृष्ण की मृत्यु के समाचार पर पांडवों व द्रौपदी का मेरु पर्वत की ओर प्रस्थान (साथ चल रहे कुत्ते सहित); अंत में केवल युधिष्ठिर व वह कुत्ता ही जीवित बचे।
- स्वर्ग आरोहण पर्व — युधिष्ठिर की मृत्यु पर पहले नरक-मार्ग, फिर स्वर्ग-प्राप्ति जहाँ रिश्तेदार पहले से मौजूद थे।
महाभारत से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| महाभारत का मूल नाम | जय संहिता |
| महाभारत के अध्यायों को कहते हैं | पर्व |
| युद्ध का वर्णन धृतराष्ट्र को किसने किया | संजय |
| महाभारत के अन्य नाम | जय, भारत, जय संहिता |
| कीचक वध किस पर्व में है | विराट पर्व |
| महाभारत में धर्म पुत्र किसे कहा गया | युधिष्ठिर |
| रामायण का वर्णन किस पर्व में है | वन पर्व |
| अश्वत्थामा की माता का नाम | कृपि |
| अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से श्रीकृष्ण ने उत्तरा के गर्भ में जिस बालक की रक्षा की | परीक्षित |
| अश्वत्थामा हाथी को किसने मारा | भीम |
| इन्द्र का कर्ण से कवच-कुंडल मांगना किस पर्व में है | विराट पर्व |
| कर्ण का बचपन का नाम | वसुषेण |
| कर्ण का वध किसने किया | अर्जुन |
| कर्ण के धनुष का नाम | विजय |
| कर्ण-वध के बाद किसके कहने पर दुर्योधन ने शल्य को सेनापति नियुक्त किया | अश्वत्थामा |
| कर्ण को पालने वाली माता का नाम | राधा |
| कर्ण ने अपने कवच-कुंडल किसे दान किए | इन्द्र को |
| जरासंध का वध किसने किया | भीम |
| कुरुक्षेत्र में कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश कहाँ दिया | ज्योतीसर |
| कृष्ण के वंश का नाम | यदुवंशी |
| कृष्ण के वंश-नाश का कारण | गांधारी का श्राप |
| कृष्ण के सारथी का नाम | दारुक |
| कौरवों की एकमात्र बहन दुशाला का विवाह किससे हुआ | जयद्रथ |
| कौरवों व पांडवों के शस्त्र-गुरु | द्रोणाचार्य |
| गांधारी ने अपनी आँखों की पट्टी कितनी बार खोली | दो बार |
| घटोत्कच की माँ का नाम | हिडिम्बा |
| चक्रव्यूह की रचना किसने की | गुरु द्रोणाचार्य |
| चक्रव्यूह को तोड़ता हुआ कौन मारा गया | अभिमन्यु |
| राजा परीक्षित के पुत्र का नाम | जनमेजय |
| वीर बर्बरीक किसके पुत्र थे | घटोत्कच |
| शकुनि का वध युद्ध के किस दिन हुआ | 18वें दिन |
| शांतनु ने किस केवट कन्या से विवाह किया | सत्यवती |
| शिखंडी किसके शिष्य थे | द्रोणाचार्य |
| शिशुपाल का वध किसने किया | कृष्ण |
| श्रीकृष्ण के शंख का नाम | पाँचजन्य |
हरियाणा में गणराज्य
यौधेय गण
यौधेय कौन थे इस बात को लेकर विद्वानों में मतभेद है। कहा जाता है कि यौधेय लोग युधिष्ठिर के वंशज थे। कुषाणों को यौधेयों ने सतलुज व यमुना के बीच के इलाके से बाहर खदेड़ा और अपना शासन स्थापित किया। कुछ विद्वान मानते हैं कि इनकी उत्पत्ति यौधेय शब्द से हुई, जिसका अर्थ है वीर यानि लड़ाकू। पाणिनि ने अष्टाध्यायी में यौधेयों को ‘आयुद्ध जीवी’ कहा है और इनकी राजधानी रोहतक बताई है; कुछ अन्य विद्वानों ने राजधानी नौरंगाबाद बताई है।
अग्र गण
अग्र गण का पता सर्वप्रथम इनके सिक्कों से लगता है, जो अग्रोहा और बरवाला से मिले हैं। अग्रोहा का पुराना नाम अग्रोदक था। अग्र गण की राजधानी अग्रोहा थी; यहाँ के राजा अग्रसेन थे।
कुणिद गण
मौर्य काल के बाद कुणिद गण का उदय हुआ। कुणिद काल के सिक्के नारायणगढ़, करनाल और सढ़ौरा (यमुनानगर) से मिले हैं।
अर्जुनायन गण
अर्जुनायन गण हरियाणा और राजस्थान में फैला हुआ था; हरियाणा में यह महेंद्रगढ़, रेवाड़ी और नारनौल आदि क्षेत्रों में फैला था।
वर्धन वंश
स्रोत: HBSE – 7वीं कक्षा हरियाणा का इतिहास
नरवर्धन, राज्यवर्धन तथा आदित्यवर्धन (505-580 ई.)
हर्षवर्धन के कवि बाणभट्ट की रचना तथा बांसखेड़ा व मधुबन के ताम्रपत्र अभिलेखों से जानकारी मिलती है कि नरवर्धन, राज्यवर्धन व आदित्यवर्धन — इन तीनों शासकों ने 505 ई. से 580 ई. तक शासन किया। ये तीनों पूर्णरूप से स्वतंत्र नहीं थे, इसी कारण इन्होंने ‘महाराज’ की उपाधि धारण की।
प्रभाकरवर्धन (580-605 ई.)
प्रभाकरवर्धन पुष्यभूति वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था। इसने ‘महाराजाधिराज’ तथा ‘परमभट्टारक’ की उपाधियाँ धारण कीं और 580 ई. से 605 ई. तक शासन किया। इसकी तीन संतानें थीं — राज्यवर्धन, राज्यश्री तथा हर्षवर्धन। बाणभट्ट ने प्रशंसा में हूणों के लिए ‘शेर’ तथा सिन्धु देश के लिए ‘ज्वर’ बताया है।
राज्यवर्धन (605-606 ई.)
प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद 605 ई. में बड़ा पुत्र राज्यवर्धन थानेसर के सिंहासन पर बैठा। इसने भी ‘महाराजाधिराज’ एवं ‘परमभट्टारक’ की उपाधियाँ धारण कीं। दूतों द्वारा सूचना मिली कि मालवा के शासक देवगुप्त, गौड़ प्रदेश के राजा शशांक तथा वल्लभी के राजा ध्रुवसेन ने संयुक्त रूप से उसके बहनोई कन्नौज के शासक गृहवर्मा मौखरी की हत्या करके बहन राज्यश्री को बंदी बना लिया।
संकट के समय छोटे भाई हर्षवर्धन ने साथ जाने का आग्रह किया, किंतु राज्यवर्धन ने यह कहते हुए इनकार किया कि ‘हिरण के शिकार के लिए एक ही शेर पर्याप्त है’। राज्यवर्धन ने मालवा के शासक देवगुप्त को पराजित कर दिया, परन्तु गौड़ प्रदेश के राजा शशांक ने धोखे से 606 ई. में उसकी हत्या कर दी।
हर्षवर्धन (606-647 ई.)
- जन्म — 4 जून 590 ई. को थानेश्वर के राज्य में। जन्म के बाद कई दिनों तक समस्त राज्य में उत्सव मनाया गया।
- माता-पिता — माता यशोमति देवी, पिता प्रभाकरवर्धन। हर्षवर्धन माता की भांति सहनशील तथा पिता की भांति साहसी व प्रतापी था।
- भाई-बहन — तीन भाई-बहनों में सबसे बड़े भाई राज्यवर्धन व बड़ी बहन राज्यश्री थीं; हर्षवर्धन सबसे छोटे थे।
- हर्षवर्धन का बचपन उनकी माता यशोमति के भतीजे ‘भंडी’ के साथ बीता।
- सम्राट हर्षवर्धन के राज्य की प्रथम राजधानी थानेसर (स्थाणेश्वर) सरस्वती नदी के किनारे स्थित थी; हर्ष का टीला पहले किला था जिसकी 5 बुर्जियाँ थीं।
- ह्वेनसांग के अनुसार हर्षवर्धन ने शासनकाल के प्रारम्भिक 6 वर्ष (606-612 ई.) पांच प्रदेशों के शासकों से लगातार युद्ध किए — अंततः हर्ष विजयी हुआ और पंजाब, कन्नौज, बिहार, बंगाल व उड़ीसा को अपने राज्य में मिला लिया।
- पुलकेशियन द्वितीय के साथ युद्ध — हर्ष उत्तर भारत का तथा पुलकेशियन द्वितीय दक्षिण भारत का शक्तिशाली शासक था। हर्ष द्वारा वल्लभी पर विजय के बाद पुलकेशियन शंकित हो गया और युद्ध अनिवार्य हो गया। 634 ई. में हर्ष ने पांच प्रदेशों की सेना एकत्र कर नर्मदा नदी के किनारे पुलकेशियन पर आक्रमण किया, जिसमें हर्ष की पराजय हुई।
ह्वेनसांग का हर्ष के बारे में विवरण
ह्वेनसांग एक चीनी यात्री था, जिसे ‘यात्रियों का राजकुमार’ कहा जाता है। यह हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया और लगभग दस वर्षों तक हर्ष के दरबार में रहा। 629 ई. में भारत यात्रा हेतु चीन से चला — ताशकंद, समरकंद व बल्ख होते हुए गांधार प्रदेश पहुंचा, फिर पंजाब, कपिलवस्तु, गया, सारनाथ, श्रावस्ती, कुशीनगर आदि की यात्रा की। दो वर्ष नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की।
दक्षिण भारत में घूमने के बाद 644 ई. में चीन के लिए प्रस्थान किया। वहाँ अपनी भारत-यात्रा का वृतांत लिखा, जिसका शीर्षक था “सी-यू-की” (पश्चिमी देश का वृतान्त) — यह ग्रंथ हर्षकालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व धार्मिक स्थिति पर प्रकाश डालता है।
एहोल (कर्नाटक के बीजापुर में बादामी के निकट) से पुलकेशियन द्वितीय का 634 ई. का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है, जिसका रचयिता जैन कवि रविकीर्ति था — इसमें पुलकेशियन द्वितीय की विजय का वर्णन है।
नोट — ह्वेनसांग हरियाणा में 634 से 644 ई. तक रहे। उनकी पुस्तक ‘सी यू की’ में थानेसर और कुरुक्षेत्र का वर्णन मिलता है। हर्षवर्धन की लिखित पुस्तकें — प्रियदर्शिका, रत्नावली और नागानंद हैं। हर्ष का दरबारी कवि बाणभट्ट था, जिसकी रचनाएँ हर्षचरित और कादम्बरी हैं। (स्रोत HBSE – 7वीं कक्षा हरियाणा का इतिहास)
गुर्जर प्रतिहार, तोमर और चौहान वंश
गुर्जर प्रतिहार वंश
हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद हरियाणा में अगला वंश गुर्जर प्रतिहार वंश था। हरियाणा में इस वंश की शुरुआत नागभट्ट द्वितीय से मानी जाती है, जिसने धर्मपाल को पराजित करके हरियाणा प्रदेश पर अधिकार किया।
- मिहिर भोज प्रथम 836 ई. से 885 ई. तक राजा रहा। इसके समय का पेहवा अभिलेख मिला है — यहाँ घोड़ों का बड़ा व्यापार केंद्र था। मिहिर भोज ने तीर्थ यात्रा का उद्देश्य लेकर राज्य का भार पुत्र महेंद्र पाल को सौंप दिया।
- महेंद्र पाल मिहिर भोज के पुत्र थे, जो कन्नौज की गद्दी पर बैठे। इनके समय का एक पेहवा अभिलेख मिला है, जिससे उस समय के मंदिर-निर्माण की जानकारी मिलती है।
हरियाणा में तोमर वंश
हरियाणा पर जब मोहम्मद गजनवी ने आक्रमण किया, उस समय यहाँ तोमर वंश था। गजनवी ने हरियाणा पर 2 बार आक्रमण किया — पहली बार 1009 ई. में असफल रहा, दूसरी बार 6 वर्ष बाद 1014 ई. में सफल हुआ।
- गजनवी ने हरियाणा में भारी लूटपाट मचाई और चक्र स्वामी (विष्णु) की प्रतिमा नष्ट कर दी — इसे मक्का-मदीना की सीढ़ियों पर लगा दिया। महमूद गजनवी को मूर्ति भंजक कहा जाता था। इसकी मृत्यु के बाद भतीजे मसूद ने हरियाणा पर आक्रमण किया।
- 1037 ई. में आक्रमण के समय हांसी के राजा कुमारपाल थे; अनंगपाल द्वितीय (1051-1081) कुमारपाल की मृत्यु के बाद तोमर गद्दी पर बैठे।
- 1043 ई. में मसूद के बेटे मादूद ने आक्रमण किया — तोमर शासक कुमारपाल देव ने अन्य शासकों की सहायता से मादूद को पराजित किया।
- प्रथम तुर्क आक्रमण के समय पंजाब में शाही वंश का शासक जयपाल शासन कर रहा था।
- मादूद की मृत्यु बाद उत्तराधिकारी इब्राहीम (1059-1109 ई.) ने पुनः आक्रमण किया। तत्कालीन तोमर नरेश तेजपाल ने बिना लड़े ही घुटने टेक दिए और हरियाणा गजनी राज के अधीन हो गया।
हरियाणा में चौहान वंश
तोमर वंश की खराब हालत देखकर अर्णराज ने 1139 में हरियाणा पर आक्रमण किया। इस राजवंश के संस्थापक राजा वासुदेव थे।
- विग्रहराज चतुर्थ चौहान वंश का शक्तिशाली शासक था; इन्होंने ‘महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की तथा दिल्ली पर कब्जा किया, जिसमें हरियाणा का हांसी दुर्ग प्रमुख था।
- चौहान वंश के महान व अन्तिम शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय थे, जिन्होंने दिल्ली के आस-पास अपने पराक्रम से चौहान वंश के महान साम्राज्य की स्थापना की। इन्हें ‘राय पिथौरा’ भी कहा जाता है। जन्म 1165 ई. में हुआ; ये अजमेर के शासक सोमेश्वर और कमला देवी के पुत्र थे।
- पृथ्वीराज चौहान ने बिना हथियार शेर को मार गिराया, जिस कारण उन्हें ‘अजमेर का शेर’ कहा जाता है। पिता की मृत्यु के बाद 1178 ई. में तेरह वर्ष की आयु में अजमेर के शासक नियुक्त हुए; नाना (अनंगपाल) ने प्रभावित होकर दिल्ली के सिंहासन का उत्तराधिकारी भी घोषित किया।
- गद्दी पर बैठने के बाद साम्राज्य-विस्तार की नीति अपनाते हुए 1182 ई. में भाड़ान के राजा को परास्त किया और रेवाड़ी, भिवानी तथा अलवर के क्षेत्र अपने साम्राज्य में मिला लिए।
चौहान वंश के प्रमुख शासक
| शासक | काल |
|---|---|
| विग्रहराज प्रथम | 734-759 ई. |
| गोविन्द राज प्रथम | 809-836 ई. |
| विग्रहराज द्वितीय | 971-988 ई. |
| विग्रहराज तृतीय | 1070-1090 ई. |
| विग्रहराज चतुर्थ | 1050-1164 ई. |
| पृथ्वीराज चौहान | 1178-1192 ई. |
स्रोत: HBSE – 6ठी कक्षा हरियाणा का इतिहास
तरावड़ी की लड़ाई
तरावड़ी (करनाल) यानी तराईन — यहाँ तीन महत्वपूर्ण युद्ध लड़े गए। पहला युद्ध 1191 ई. में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच हुआ, जिसमें पृथ्वीराज चौहान विजयी रहे। दूसरा युद्ध भी 1192 ई. में दोनों के बीच हुआ, जिसमें मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चौहान को धोखे से हराया। मोहम्मद गौरी की मृत्यु 1206 ई. में हुई।
पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंदरबरदाई (पृथ्वी चंद भट्ट भी कहा जाता है) थे। तराईन युद्ध की जानकारी इनकी पुस्तक पृथ्वीराज रासो से मिलती है। तराईन का तीसरा युद्ध 1215-16 ई. में इल्तुतमिश ने यल्दौज को पराजित करके जीता — इसके बाद गुलाम वंश की स्थापना होती है।
गुलाम वंश (1206-90)
गौरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली का राजा बना, जिसने 1206 में गुलाम वंश की स्थापना की। अगला राजा इल्तुतमिश बना, जो 1210 से 1236 तक राजा रहा। इसके बाद रुकूनुद्दीन गद्दी पर बैठा जो एक कमजोर शासक था।
- 1236 से 1240 ई. तक रज़िया सुल्तान गद्दी पर बैठीं — यह भारत की प्रथम मुस्लिम महिला शासिका थीं। रज़िया बेगम ने बठिंडा के सूबेदार अल्तूनिया से शादी की। अल्तूनिया व रज़िया बेगम हरियाणा होते हुए दिल्ली लौट रहे थे, तब रज़िया के भाई बहराम ने 13 अक्टूबर 1240 को कैथल में दोनों का कत्ल कर दिया।
- रज़िया बेगम का मकबरा कैथल में स्थित है। इसके बाद बहराम 1240 से 1242 तक राजा रहा।
बलबन (गुलाम वंश का शासक)
- बलबन 1266 से 1288 तक राजा रहा। 1263 ई. में बलबन दिल्ली का सुल्तान बना; इससे पूर्व वह हाँसी का इक्तेदार था। 1265 में बलबन ने हरियाणा में लगभग सभी वन कटवा दिए। इसी वर्ष एक विशाल सेना के साथ आक्रमण करके मेवातियों को पराजित किया।
- नसीरूद्दीन महमूद (1246-1266 राजा) एक पागल व कमजोर राजा था; इस समय बलबन ही कार्यकाल संभालता था। बलबन के समय मेव जाति के लोग आक्रमण करते थे। 13वीं शताब्दी में बलबन ने गोपाल गिरी दुर्ग बनवाया, जो हरियाणा के गुरुग्राम में स्थित है।
खिलजी, तुगलक, लोदी वंश
खिलजी वंश (1290-1320)
- अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) के शासनकाल में मंगोलों ने हरियाणा पर आक्रमण किया। इस आक्रमण को हिसार तथा हाँसी में अलाउद्दीन खिलजी के हिन्दू सेनानायक नानक ने विफल किया।
- अलाउद्दीन खिलजी ने लगभग 1303 ई. में हांसी शहर में बड़ी गेट का निर्माण करवाया था। इसने गुरुग्राम के गोपालगिरी दुर्ग को केंद्र बिंदु बनाया था।
हरियाणा में तुगलक वंश (1320-1414)
तुगलक वंश की स्थापना ग्यासुद्दीन तुगलक ने की। इसकी मृत्यु के बाद मोहम्मद बिन तुगलक गद्दी पर बैठा, फिर फिरोजशाह तुगलक गद्दी पर बैठा।
फिरोज शाह तुगलक (1351-1388)
- फिरोज शाह तुगलक इस वंश का शक्तिशाली राजा था, जिसने हरियाणा पर काफी समय तक राज किया।
- 1351-52 में अपने बेटे फतेह खां के नाम पर फतेहाबाद शहर की स्थापना की। 1354 ई. में फिरोजा-ए-हिसार नाम से एक शहर बसाया, जिसे आज हिसार कहते हैं। हिसार फारसी भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है — दुर्ग या किला।
- फिरोजशाह तुगलक ने एक किला बनवाया, जिसके चार गेट थे — नागोरी गेट, मोरी गेट, तलाकी गेट और फर्खनगर गेट।
- फिरोजशाह की प्रेमिका का नाम रुकसती था, जिसे ‘गुजरी’ कहा जाता था। इन्होंने गुजरी से शादी की और उसके लिए एक महल बनवाया, जो गुजरी महल के नाम से जाना गया — इसमें एक सभा (दीवान-ए-आम) तथा 20 फीट ऊँची लाट की मस्जिद भी बनाई गई। गुजरी महल में 1 स्तंभ पर 8 अभिलेख मिले हैं।
- फिरोजशाह तुगलक ने सिरसा, फतेहाबाद, हिसार में नहरों का निर्माण करवाया; अंबाला स्थित टोपरा अभिलेख को दिल्ली ले गया; सिरसा में हरनी खेड़ा नामक शहर बसाया। इसके समय गोहाना में विद्रोह हुआ था।
तैमूर लंग का आक्रमण
तैमूर मध्य एशिया का एक लुटेरा था, जिसने 1398 में भारत पर आक्रमण किया। तैमूर हरियाणा के सिरसा-फतेहाबाद को लूटता हुआ टोहाना, रानियाँ, सिरसा और मोरनी पहाड़ी की तरफ निकल गया।
लोदी वंश (1451-1526)
लोदी वंश की स्थापना बहलोल लोदी ने की। इसके बाद सिकंदर लोदी, फिर इब्राहिम लोदी (1517-1526) राजा बना। पानीपत के पहले युद्ध में इब्राहीम लोदी मारा गया; पानीपत में इनका मकबरा है।
पानीपत का पहला युद्ध
यह युद्ध पानीपत में 21 अप्रैल 1526 को इब्राहिम लोदी और बाबर के बीच हुआ। इसमें इब्राहिम लोदी मारा गया और बाबर विजयी हुआ। बाबर ने इस युद्ध की खुशी में पानीपत में अपनी पत्नी के नाम पर काबुली बाग मस्जिद बनवाई। इस युद्ध में आर्टलरी और बन्दूक-पाउडर के अग्नि आयुध (तोप) का प्रयोग पहली बार किया गया।
हरियाणा में मुगल वंश (1526-1857)
हरियाणा के वीर मोहन सिंह मंढार
मोहन सिंह मंढार का सम्बन्ध हरियाणा के कैथल जिले से था। उसने अपने गाँव को घेरने वाले बाबर के भेजे मुगलों को भारी क्षति पहुँचाई। अपने लोगों को बचाने के प्रयत्न में मोहन सिंह को कैद कर दिल्ली ले जाया गया। बाबर ने सज़ा-ए-मौत का फरमान सुनाया, पर यह भी कहा कि इस्लाम कबूल करने पर सज़ा माफ हो जाएगी। इस्लाम स्वीकार न करने पर मोहन सिंह को मौत के घाट उतार दिया गया।
हसन खाँ मेवाती
16 मार्च, 1527 ई. को हसन खां ने राणा सांगा के साथ मिलकर ‘खानवा’ के मैदान में बाबर से लोहा लिया। इसी दौरान एक तोप का गोला हसन खाँ मेवाती के सीने पर लगा और वे युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
शेरशाह सूरी
- शेरशाह सूरी नारनौल के रहने वाले थे। मुगलों के प्रति घृणा भाव रखते हुए इन्होंने 1539 ई. में चौसा तथा 1540 ई. में कन्नौज/बिलग्राम के युद्धों में हुमायूँ को पराजित कर हिन्दुस्तान छोड़ने पर विवश किया। इनके प्रयासों से मुगल 1540 से 1555 ई. — अर्थात् 15 वर्ष — हिन्दुस्तान के मानचित्र से गायब रहे।
- हुमायूँ को हराने के बाद शेरशाह को रायसीन, मारवाड़ एवं कालिंजर के राजपूत शासकों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। कालिंजर के युद्ध में बारूद फटने से 22 मई, 1545 ई. को शेरशाह की मृत्यु हुई। इसने 1540-1545 ई. तक शासन किया — इस दौरान सड़कें व सराएं बनवाईं तथा मुद्रा, डाक व भूमि-कर व्यवस्था में कई सुधार किए।
- शेरशाह की मृत्यु बाद पुत्र इस्लामशाह ने गद्दी संभाली। 1552 ई. में इस्लामशाह की मृत्यु बाद उसके बारह वर्षीय पुत्र को शासक बनाया गया, लेकिन तीन दिन बाद हत्या कर आदिल शाह ने शासन संभाल लिया।
हेमचन्द्र विक्रमादित्य (हेमू)
- पानीपत की दूसरी लड़ाई के प्रमुख नायक हेमचन्द्र विक्रमादित्य लगभग तीन शताब्दियों बाद दिल्ली पर मुस्लिम शासन के दौरान एकमात्र अन्तिम हिन्दू राजा थे जो सोलहवीं शताब्दी में दिल्ली के सिंहासन पर बैठे। इन्होंने जीवन में 22 युद्ध जीतकर, देश की एकता व अखंडता के लिए जीवनभर प्रयत्न करते हुए अपने जीवन का बलिदान दिया। अकबर के दरबारी अबुल फज़ल ने भी ‘अकबरनामा’ में हेमू की प्रशंसा की है।
- हेमचन्द्र विक्रमादित्य का जन्म राजस्थान के अलवर के पास माछेरी गाँव में 1501 ई. (विक्रमी सम्वत् 1558) में संत पूर्णदास के घर हुआ। परिवार बाद में रेवाड़ी के कुतुबपुर में बस गया, जहाँ हेमू ने संस्कृत, हिन्दी, फारसी तथा अरबी की शिक्षा प्राप्त की। बचपन से ही कुश्ती व घुड़सवारी का शौक था — उन दिनों रेवाड़ी एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र था।
- हेमू ने बारूद बनाने के प्रमुख तत्व ‘शोरे’ का व्यापार शुरू किया तथा शेरशाह सूरी को बारूद आपूर्ति में अहम भूमिका निभाई।
- 7 अक्टूबर, 1556 ई. को दिल्ली के पुराने किले में वैदिक रीति से हेमू का राज्याभिषेक हुआ — सैकड़ों वर्षों की गुलामी के बाद हिन्दू साम्राज्य की स्थापना का विजय दिवस। लगातार युद्ध जीतने के कारण इन्हें ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि दी गई।
पानीपत की दूसरी लड़ाई
- 5 नवम्बर, 1556 ई. को हेमू को मुगल सेना पानीपत पहुँचने का समाचार मिला; हेमू ने पूरी सेना से मुगल सेना को तीन ओर से घेरकर आक्रमण किया।
- हेमू अपने प्रिय हाथी ‘हवाई’ पर सवार होकर सैनिकों का मनोबल बढ़ा रहा था। अकबर को इस युद्ध में पानीपत से आठ मील दूर सुरक्षित स्थान पर रखा गया था।
- हेमू के एक तीर बायीं आँख में लगा — वह बेहोश होकर हाथी के हौदे में गिर पड़ा, सेनापति को न देखकर सेना में भगदड़ मच गई। हेमू को बन्दी बनाकर अकबर के सामने लाया गया तथा सिर धड़ से अलग कर दिया गया।
- अकबर ने गाजी (काफिरों को मारने वाला) की उपाधि धारण की। हेमू का सिर काबुल के दिल्ली दरवाजे पर तथा धड़ दिल्ली के पुराने किले के बाहर लटका दिया गया। बैरम खाँ ने विरोधियों की सामूहिक हत्या का आदेश दिया।
- गाँव सौंदापुर (पानीपत) में हेमू का स्मृति स्थल है। हेमचन्द्र विक्रमादित्य ने जीवन में 22 युद्ध जीते एवं 29 दिन तक दिल्ली पर सुशासन किया।
बंदा सिंह बहादुर का संघर्ष
औरंगजेब की मृत्यु से उत्पन्न अराजकता का लाभ उठाते हुए बंदा सिंह बहादुर ने 1709 ई. में हरियाणा में सोनीपत के निकट सेहरी खाण्डा नामक स्थान पर डेरा लगाया (1708 ई. में इसे अपना प्रमुख केन्द्र बनाया)। सेहरी खाण्डा में बंदा बहादुर की प्रतिमा स्थापित है। प्रशासन सुचारू चलाने हेतु बाज सिंह को सरहिंद, फतेह सिंह को समाना तथा विनोद सिंह व राम सिंह को थानेसर का सूबेदार बनाया।
पानीपत का तृतीय युद्ध
- 14 जनवरी 1761 को सदाशिव राव भाऊ तथा अहमदशाह अब्दाली के मध्य युद्ध हुआ। कड़े संघर्ष बाद युद्ध में मराठों की हार हुई — विश्वास राव, सदाशिव राव भाऊ, जसवंत राव, तंकोजी सिंधिया जैसे सरदार तथा लगभग 28,000 सैनिक काम आए। मराठा इतिहासकार काशीराज पंडित के अनुसार, “पानीपत का तृतीय युद्ध मराठों के लिए प्रलयकारी सिद्ध हुआ”।
- बालाजी बाजीराव यह पराजय सहन नहीं कर सके तथा 23 जून 1761 को आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हुए।
जाट
- जाट मध्यकाल में दिल्ली के आस-पास, मथुरा, आगरा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा एवं पंजाब में निवास करते थे — मुख्यतः कृषि करते थे तथा बलिष्ठ शरीर व शौर्य से परिपूर्ण थे। इन्होंने महमूद गजनवी एवं उसके उत्तराधिकारियों से लोहा लिया।
- मथुरा-आगरा के जाटों ने गोकुल के नेतृत्व में औरंगजेब के अत्याचारों के विरुद्ध 1669 ई. में भयंकर विद्रोह किया। विद्रोह दबा दिया गया व गोकुल शहीद हुआ, लेकिन इसने जाटों को लगातार संघर्ष के लिए प्रेरित किया — बाद में बृजराज, राजा राम, चूड़ामन, बदन सिंह व सूरजमल के नेतृत्व में संघर्ष जारी रहा, जिसने मुगलों के पतन में मुख्य भूमिका निभाई।
- तिलपत का प्रथम युद्ध (1669) — गोकुला जाट व औरंगजेब के बीच; गोकुला जाट पराजित हुआ।
- तिलपत का दूसरा युद्ध (1764) — नजीबुद्दौला और जाट राजा जवाहर सिंह के बीच; नजीबुद्दौला की हार हुई।
सतनामी
सतनामी सम्प्रदाय मध्ययुग के भक्ति आंदोलन की ही एक उपज थी। इसकी स्थापना नारनौल क्षेत्र के बिसेर गाँव में बीरभान नामक भक्त ने ‘साध’ रूप में की — यह रैदासी सम्प्रदाय की ही एक शाखा थी। मुगल सम्राट औरंगजेब के समय 1672 ई. में नारनौल में सतनामियों ने विद्रोह किया था।
करनाल का युद्ध
यह युद्ध 24 फरवरी 1739 को नादिरशाह व मोहम्मद शाह रंगीला के बीच हुआ। इसमें नादिर शाह विजयी रहा और कोहिनूर हीरा तथा मयूर सिंहासन लूटकर ईरान चला गया। महारानी विक्टोरिया मेमोरियल हाल करनाल में है।
हरियाणा में जॉर्ज थॉमस
- जॉर्ज थॉमस का जन्म आयरलैंड में हुआ; 1782 में भारत आया और 1787 में दिल्ली पहुँचा। पहले निजाम की सेना में तोपची बना, फिर समरू बेगम की सेना में भर्ती हुआ। समरू बेगम ने अपनी गोद ली हुई बेटी की शादी जॉर्ज से करवाई थी; वर्तमान हरियाणा के गुरुग्राम जिले में समरू बेगम का महल है।
- 1793 में मेवात क्षेत्र के मराठा सुबेदार ने थॉमस को मेवात संभालने का अधिकार दिया और झज्जर व पटौदी के कुछ गाँव भी दिए। धीरे-धीरे इसने रोहतक, गुड़गाँव, सोनीपत, भिवानी आदि के गाँव मिला लिए। तब अपनी राजधानी ‘हाँसी’ बनाई तथा वहाँ टकसाल स्थापित की — इसमें ढाले सिक्कों को ‘सिक्का-ए-साहिब’ कहा जाता था।
- जॉर्ज ने 1794 में झज्जर और बहादुरगढ़ को लूटा और 1797 में हांसी को राजधानी बनाया (हांसी का किला सुरक्षित था)। जॉर्ज थॉमस को पानी वाली जहाज चलाने का शौक था — इसने हिसार में जहाजगढ़ कोठी बनाई (ध्यान रहे, एक ‘जहाजगढ़’ नामक गाँव झज्जर में भी है, जहाँ हरियाणा का सबसे बड़ा पशु मेला भरता है)। जॉर्ज ने 1797-1802 तक राज किया।
जॉर्ज थॉमस के प्रमुख युद्ध
| युद्ध/घटना | वर्ष | विवरण |
|---|---|---|
| भांडवास का युद्ध | 1789 | रेवाड़ी में शाह आलम द्वितीय व विद्रोही वजीर नजफ कुली खान के बीच; जॉर्ज थॉमस ने शाह-आलम-द्वितीय की जान बचाकर समरू बेगम का विश्वासपात्र बना |
| बेरी की प्रथम लड़ाई | 1794 | जाटों व जॉर्ज थॉमस के मध्य; थॉमस की जीत |
| काहनौर का विद्रोह | 1796 | रांघड़ किसानों व हाँसी के शासक थॉमस के बीच; थॉमस की जीत |
| नारनौंद का युद्ध | 1799 | सिखों व जॉर्ज थॉमस के बीच नारनौंद (हांसी) में; थॉमस की जीत |
| बेरी की दूसरी लड़ाई | 1801 | जॉर्ज थॉमस व सिक्खों-मराठों की संयुक्त सेना के मध्य; थॉमस की हार |
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन
- 1803 ई. में मराठों (दौलत राव सिंधिया) और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच सुर्जिअर्जन गाँव की संधि हुई।
- हरियाणा क्षेत्र को अंग्रेजों ने 1805 में प्रशासनिक सुविधा हेतु दो भागों में बांटा। एक नियंत्रण अंग्रेजों के सीधे अधीन रहा, जिसमें पानीपत, सोनीपत, पालमपुर, नूँह, हथीन, सोहना, पलवल तथा रेवाड़ी शामिल थे।
- दूसरा शेष क्षेत्र उन सामंतों-सरदारों को दिया गया जिन्होंने आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की — राव तेजसिंह को रेवाड़ी का शेष भाग, अहमद बख्शा को रोहतक-हिसार-लाहौत व फिरोजपुर-झिरका का क्षेत्र, हांसी की बेगम समरू को करनाल व गुड़गाँव के कुछ गाँव, मुहम्मद अली खाँ को पलवल का शेष भाग; पुराने शासकों को बल्लभगढ़, जींद, थानेसर आदि क्षेत्र दिए गए।
- इस बंटवारे से लोग संतुष्ट नहीं हुए और अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष होने लगे — अम्बाला, कुरुक्षेत्र व करनाल में राजपूतों-सैनियों-सिक्खों ने, रोहतक में जाटों-रांघड़ों ने, गुड़गाँव में मेवों-अहीरों-गुर्जरों ने और हिसार में भड़ियों-रांघड़ों-बिश्नोइयों ने अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष किए।
- 1809-10 में अंग्रेजों ने वह क्षेत्र सामंतों-सरदारों से छीन लिया जो उन्हें दिया गया था — इसके बाद अलग-अलग रियासतों के राजाओं ने अंग्रेजों का विरोध शुरू किया।
हरियाणा के विद्रोह
| वर्ष | विद्रोह | नेतृत्व |
|---|---|---|
| 1814 | जींद का विद्रोह | प्रताप सिंह |
| 1818 | रानियाँ (सिरसा) का विद्रोह | जाबित खान |
| 1818 | छछरोली (यमुनानगर) का विद्रोह | राजा जोधा सिंह |
| 1824 | किसान विद्रोह (हिसार, रोहतक, गुड़गाँव) | स्थानीय किसान |
| 1835 | बनावली (फतेहाबाद) का विद्रोह | गुलाब सिंह |
| 1843 | कैथल का विद्रोह | गुलाब सिंह और साहिब कौर |
| 1845 | लाडवा (कुरुक्षेत्र) का विद्रोह | अजीत सिंह |
| 1849 | सिखों का विद्रोह | — |
लाडवा का विद्रोह
वर्ष 1743 में सरदार सिंह ने उत्तरी हरियाणा में ‘लाडवा रियासत’ की स्थापना की थी। लाडवा का पहला विद्रोह (1805) शासक गुरदीत सिंह ने स्थानीय लोगों व थानेसर शासक की मदद से अंग्रेजी सेनापति कर्नल बर्न से 1803 ई. में युद्ध किया; इसके बाद गुरदत्त सिंह ने अंग्रेजों को खूब परेशान किया। उत्तराधिकारी पुत्र अजीतसिंह हुआ।
लाडवा का दूसरा विद्रोह — 1845 ई. में अंग्रेजों ने राजा अजीत सिंह को ‘विद्रोही’ घोषित कर सहारनपुर में रखा। प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-46) में अजीतसिंह जेल से फरार हो गया। 1846 में इसने लुधियाना पर हमला कर छावनी को जलाकर राख कर दिया।
जींद का विद्रोह
1763 ई. में जींद रियासत की नींव फूल मिसल के सरदार स्वरूप सिंह ने रखी थी। 1813 में तत्कालीन शासक भागसिंह को लकवा मार जाने से शासन असमर्थ हो गया। 1814 को भागसिंह के पुत्र प्रतापसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह किया।
गुड़गाँव व हिसार में कृषक विद्रोह
1824 ई. में किसानों ने कंपनी की शोषणकारी सरकार समाप्त करने का संकल्प लिया। रोहतक के साहसी जाटों की विद्रोह-शुरुआत के साथ गुड़ग्राम और हिसार जिलों के असंख्य लोग आंदोलन में कूद पड़े। 1824 में बर्मा युद्ध में अंग्रेजों की पराजय का लाभ उठाकर रोहतक, हिसार व गुड़गाँव के कृषकों ने बैंकों में लूट-पाट की। बाद में राजा सूरजमल ने विद्रोहियों के साथ मिलकर युद्ध किया, लेकिन अंग्रेज जीत गए।
हरियाणा में 1857 की क्रांति
1803 ई. से 1856 ई. तक अंग्रेजों की प्रशासनिक, सामाजिक, धार्मिक शोषण-व्यवस्था से लोगों में असंतोष पैदा हुआ। क्रांति में हरियाणा के प्रमुख केंद्र थे — अम्बाला, गुड़ग्राम, रेवाड़ी, हांसी, हिसार, करनाल, रोहतक, रोहनात गाँव (भिवानी), सिरसा, पानीपत, कुरुक्षेत्र और बल्लभगढ़। रोहतक में 159 व गुड़गाँव में 228 क्रांतिकारियों को फाँसी दी गई थी।
हरियाणा के केन्द्र क्रांतिकारियों के नाम
| केन्द्र | क्रांतिकारी |
|---|---|
| झज्जर | नवाब अब्दुर्रहमान खान |
| फर्रुखनगर | नवाब अहमद अली |
| झाड़सा परगना | चौधरी बख्तावर सिंह |
| हांसी | लाला हुकमचंद जैन / मीर बेगम |
| बल्लभगढ़ | राजा नाहर सिंह |
| दुजाना | हसन अली |
| रानियां | नूर समद खां |
| रोहतक | बिरासत खां |
| हिसार | मोहम्मद आजम |
| रेवाड़ी | राव तुलाराम / गोपाल देव |
अम्बाला में क्रांति
कहा जाता है कि मेरठ में क्रांति भड़कने से नौ घंटे पहले अम्बाला में सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया था। अम्बाला फौज में 60वीं भारतीय स्थल सेना व 5वीं देशी पलटन थी। क्रांति के विफल होने का प्रमुख कारण शामसिंह नामक सिपाई था, जिसने क्रांति से पहले ही अंग्रेजों को सूचना दे दी — इस प्रकार अंग्रेजों ने अम्बाला में क्रांति दबा दी।
गुड़गाँव एवं बल्लभगढ़ में क्रांति
- 13 मई को 300 सैनिक गुड़गाँव पर आक्रमण के लिए बढ़े। कलैक्टर-मैजिस्ट्रेट फोर्ड ने रोकने का असफल प्रयास किया। 14 मई को क्रांतिकारियों ने फोर्ड के ऑफिस पर आक्रमण कर दिया — फोर्ड भोंडसी होते हुए मथुरा भाग गया। क्रांतिकारियों को खजाने से 78 लाख रुपये हाथ लगे।
- बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह ने क्रांति में बढ़-चढ़कर भाग लिया, परन्तु धोखे से अंग्रेजों ने सन्धि के बहाने गिरफ्तार करके 9 जनवरी 1858 ई. को फाँसी दे दी। दिल्ली के चांदनी चौक पर सरेआम फाँसी दी गई। राजा नाहर सिंह का जन्म 6 अप्रैल 1823 को बल्लभगढ़ में राजा बहादुर सिंह (पिता) के घर हुआ था; इनके पूर्वज तेवतिया गौत्र के जाट थे।
- वर्तमान में बल्लभगढ़ मेट्रो स्टेशन व नाहर सिंह स्टेडियम (क्रिकेट स्टेडियम, स्थापना 1981) राजा नाहर सिंह के नाम पर हैं। बल्लभगढ़ के पहले राजा बलराम सिंह तेवतिया थे।
हांसी में क्रांति
हांसी की क्रांति 14-15 मई को शुरू हुई। पूड़ी गाँव के मंगल खान व सहयोगी कैदे खाँ ने सबसे पहले बगावत का बिगुल बजाया। इस क्षेत्र के लिए अंग्रेजों ने हरियाणा लाइट इनफेंट्री की 2 टुकड़ी (चौथी इरेग्युलर और दादरी केवलरी) तैनात की थी। हांसी के आसपास के गाँव (जमालपुर, हाजिमपुर, भाटल, अलीपुर, मंगाली) के क्रांतिकारियों को हांसी लाकर मुख्य बाजार में पत्थर की गिरड़ी के नीचे कुचलवा दिया गया — जिस कारण यह सड़क आज भी लाल सड़क के नाम से जानी जाती है।
रोहनात में क्रांति
रोहनात गाँव (वर्तमान भिवानी जिले में, हांसी से आठ मील दक्षिण) पर अंग्रेज सैनिकों ने 800 घुड़सवार व 4 तोपों सहित तोशाम पर हमला किया, फिर रोहनात गाँव पर अंग्रेजी व बीकानेर सेना ने जबरदस्त हमला किया। गाँव के देशभक्त क्रांतिकारियों ने जेली, बल्लम, गंडासों आदि से डटकर मुकाबला किया। ‘मंगल खां’ व ‘बिरड़ दास बैरागी’ को तोप से उड़ा दिया गया व ‘रूपा खाती’ को मार डाला गया।
हिसार में क्रांति
हांसी में विद्रोह की ज्वाला सुलगने के तीन घंटे बाद हिसार में भी विद्रोह भड़का — जिलाधीश डिप्टी कमिश्नर मि. बेडबर्न को परिवार सहित कत्ल कर दिया गया। हाजमपुर, जमालपुर, भाटोल रांगड़ान आदि गाँवों के लोगों ने स्वदेशी हथियारों से हमला किया और किले में 11 अंग्रेज अफसरों को मार डाला।
सिरसा में क्रांति
रानियां के भट्टी नवाब नूर समद खां ने चाचा गुलाम अली खां के साथ 4000 भट्टी सैनिकों को लेकर सिरसा पर कब्जा कर स्वयं को गवर्नर घोषित कर दिया — कुल 3 सप्ताह तक सिरसा पर अधिकार रहा। चीफ कमिश्नर सर जॉन लारेंस के आदेश पर 8 जून, 1857 ई. को फिरोजपुर के डिप्टी कमिश्नर जनरल वान कोर्टलैंड ने 550 गौरे फौजी व दो तोपों के साथ पुनः कब्जा करने कूच किया।
रेवाड़ी में क्रांति
- अंग्रेज शावर्स के रेवाड़ी पहुँचने से पहले ही राव तुलाराम ने 5 अक्टूबर, 1857 ई. को किला खाली कर दिया। ब्रिगेडियर जनरल शावर्स के आक्रमण के समय राव तुलाराम, चाचा राव किशन सिंह, भाई राव गोपाल देव, झज्जर के जनरल अब्दुल समद खान व भट्टू कलां के मोहम्मद आजम सुरक्षित स्थानों की ओर चले गए थे।
- राव तुला राम का जन्म 9 दिसम्बर 1825 को रामपुरा (रेवाड़ी) में पिता राव पूरन सिंह व माता रानी ज्ञान कौर के घर हुआ। सहायता के लिए विदेश जाने का प्रयास किया, अफगानिस्तान तक ही पहुँच पाए — काबुल में 23 सितम्बर 1863 ई. को देहांत हो गया। बलिदान के कारण रेवाड़ी को ‘वीरभूमि’ भी कहा जाता है।
- 1857 की क्रांति में सबसे महत्वपूर्ण योगदान पर भारत सरकार द्वारा स्मृति में 23 सितम्बर 2001 को डाक टिकट जारी किया गया। इन्होंने 1838 से 1857 तक राज पाट संभाला। हर वर्ष 23 सितम्बर को हरियाणा में शहीद दिवस मनाया जाता है। राव तुला राम स्टेडियम रेवाड़ी में व राव तुला राम चौक झज्जर में है।
नसीबपुर की क्रांति
नसीबपुर में राव तुलाराम की सेना का नेतृत्व राव किशन सिंह कर रहे थे, साथ छोटे भाई राव रामलाल भी थे। यह क्रांति 16 नवम्बर 1857 को नारनौल के समीप नसीबपुर में हुई — अंग्रेज जेरार्ड इस क्रांति में मारा गया, परंतु राव किशन सिंह भी वीरगति को प्राप्त हुए। कवाली गाँव में उनकी याद में जय बाबा राव जी की छतरी बनी है। नोट — 1857 की क्रांति में हरियाणा का शहीदी स्मारक नसीबपुर (नारनौल) है।
दिल्ली
दिल्ली पर अधिकार होने के बाद भारतीय सैनिकों ने गुड़गाँव के कलेक्टर फोर्ड को खदेड़कर गुड़गाँव पर अधिकार कर लिया। राव तुलाराम ने रेवाड़ी में, लाला हुकमचन्द जैन ने हाँसी में, मुहम्मद शहजादा आजिम ने हिसार में, नूरसमदखान ने रानियां में, अब्दुर्रहमान व उसके दामाद समदखान ने झज्जर में, बाबा शाहमल तोमर ने बड़ौत (मेरठ) में एवं राजा नाहर सिंह ने बल्लभगढ़ में क्रान्ति का बिगुल बजाया।
सितम्बर 1857 ई. में अंग्रेजों ने कड़े संघर्ष बाद दिल्ली पर पुनः अधिकार किया और बहादुरशाह जफ़र को हुमायूं के मकबरे से बन्दी बनाकर रंगून भेज दिया गया, जहाँ 1863 ई. में उनकी मृत्यु हो गई।
स्रोत: HBSE – 8वीं कक्षा हरियाणा का इतिहास
राष्ट्रीय आन्दोलन में हरियाणा की भूमिका
कांग्रेस की स्थापना
1885 ई. में कांग्रेस की स्थापना हुई तो 72 सदस्यों में लाला मुरलीधर भी शामिल थे। लाला मुरलीधर ने अम्बाला में तथा लाला लाजपत राय ने हिसार में कांग्रेस की शाखाएँ स्थापित कीं। बंगाल विभाजन (1905) के विरोध के कारण 1907 में लाला लाजपत राय को देश निकाला देकर मांडले जेल (म्यांमार) भेजा गया।
सामाजिक और धार्मिक आंदोलन
आर्य समाज की स्थापना 1875 में स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपने गुरु विरजानंद की प्रेरणा से मुंबई में की। 1880 में स्वामी जी ने रेवाड़ी में आर्य समाज की स्थापना की (स्वामी जी 1880 में रेवाड़ी आए थे)। हिसार में आर्य समाज की शाखा लाला लाजपत राय ने 1886 में खोली।
स्वदेशी आंदोलन
स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव हरियाणा में भी पड़ा। लाला मुरलीधर ने 1891 के कांग्रेस नागपुर अधिवेशन में स्वदेशी वस्तुओं के इस्तेमाल पर जोर दिया तथा हरियाणा के अंबाला से स्वदेशी आंदोलन शुरू किया; हिसार से यह आंदोलन लाला लाजपत राय ने चलाया।
होम रुल आंदोलन
आयरलैंड निवासी एनी बेसेंट और बाल गंगाधर तिलक ने होम रूल की स्थापना 1916 में मद्रास और पुणे में की। हरियाणा क्षेत्र में होम रूल के प्रमुख नेता नेकीराम, एम.ए. अंसारी और शंकर लाल थे।
रॉलेट एक्ट का विरोध
हरियाणा में रॉलेट एक्ट का विरोध 1919 में अंबाला से शुरू हुआ। इसका जायजा लेने के लिए महात्मा गांधी हरियाणा होते हुए पंजाब-लाहौर जा रहे थे — 9 अप्रैल 1919 को महात्मा गांधी की गिरफ्तारी पलवल रेलवे स्टेशन पर की गई और उन्हें दोबारा मुंबई जाने वाली ट्रेन में बिठा दिया गया।
स्रोत: HBSE – 9वीं कक्षा अध्याय 9, पृष्ठ 128
पंजाब क्रांतिकारी आंदोलन
इसके सरदार अजित सिंह, पिंडी दास, अम्बा प्रसाद, लालचंद फलक और दीनदयाल बांके प्रमुख नेता थे। बांके दयाल की कविता पगड़ी संभाल जट्टा और अजीत सिंह के भाषणों ने लोगों को उत्साह से भरा। हरियाणा के भाई परमानंद, बाबु बालमुकुन्द गुप्त आदि ने बढ़-चढ़कर भाग लिया।
ग़दर आंदोलन
21 अप्रैल 1913 में हिन्दुस्तान एसोसिएशन बनाई गई, जिसे ग़दर पार्टी का नाम दिया गया। प्रमुख नेता सोहन सिंह, मुहम्मद बरकतुल्ला, कर्तार सिंह और हरियाणा के काशीराम व भाई परमानन्द आदि थे।
जलियाँवाला बाग हत्याकांड
9 अप्रैल 1919 ई. को गांधी जी को पलवल रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार किया गया। इसी दौरान 13 अप्रैल, 1919 ई. को अमृतसर के जलियाँवाला बाग में शान्तिपूर्वक चल रही सभा पर जनरल डायर ने गोलियाँ चला दीं।
असहयोग आंदोलन में योगदान
- 1920 में हरियाणा में लाला लाजपत राय, लाला दुनी चन्द, लाला मुरलीधर, गणपतराव आदि नेताओं ने विभिन्न शहरों में जनसभाएं आयोजित कीं। हजारों आंदोलनकारी गिरफ्तार किए गए — झज्जर के पंडित श्रीराम शर्मा ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया।
- 1920 के इस आंदोलन का नेतृत्व महात्मा गांधी कर रहे थे। हरियाणा में प्रमुख नेता लाला लाजपत राय थे; इधर चौधरी छोटूराम ने इसका विरोध किया और कांग्रेस पार्टी छोड़ दी। महात्मा गांधी ने रोहतक के राम लीला मैदान में एक बड़ी रैली की, जिसमें मोहम्मद अली जिन्ना भी शामिल हुए। इसके बाद 22 अक्टूबर 1920 को भिवानी में अंबाला डिवीजन की कांफ्रेंस हुई, जिसमें महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के लिए ‘शैतान’ शब्द का प्रयोग किया।
साइमन कमीशन का विरोध
1927 में सर साइमन की अध्यक्षता में 7 सदस्यीय कमीशन नियुक्त हुआ। हरियाणा के भिवानी, रोहतक, झज्जर, हिसार और अम्बाला में प्रभात फेरी निकालकर विरोध प्रदर्शन हुआ। लाठी चार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हुए और 17 नवम्बर, 1928 ई. को उनका निधन हो गया। विरोध में मार्च 1929 ई. में रोहतक में प्रान्तीय कांफ्रेंस बुलाई गई जिसमें 30 हजार की भीड़ ने अंग्रेजों की निन्दा की।
सविनय अवज्ञा आंदोलन में भागीदारी
अम्बाला के सूरजभान की अध्यक्षता में 15 अप्रैल, 1930 ई. को झज्जर के गाँव शाहिदपुर में नमक बनाकर आंदोलन शुरू हुआ। भिवानी में गणपत राय, रेवाड़ी में खड़गबहादुर व भगवान दास, हिसार में नेकी राम, अम्बाला में विद्यावती और करनाल में गोपीचन्द आदि ने जन-आंदोलन आगे बढ़ाया। महिलाओं ने शराब व विदेशी सामान बेचने वालों की दुकानों पर धरना दिया; किसानों ने ‘कर मत दो’ अभियान चलाया; विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई।
1938 ई. में मदिना (रोहतक) में प्रान्तीय कॉन्फ्रेंस हुई। सुभाष चन्द्र बोस के हरियाणा दौरे से जनता में नया जोश पैदा हुआ और स्वतंत्रता संघर्ष ने जोर पकड़ा।
भारत छोड़ो आंदोलन में योगदान
8 अगस्त 1942 ई. को गांधी जी ने ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध हड़ताल की। हिसार, रोहतक, अम्बाला, करनाल आदि शहरों में सरकारी भवनों पर तिरंगा फहराया गया। रेवाड़ी के सत्यानारायण वशिष्ठ 1944 ई. में मात्र 32 वर्ष की आयु में शहीद हो गए। प्रैस एवं रेडियो पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया।
आजाद हिन्द फौज में भूमिका
1938 ई. में सुभाष चन्द्र बोस ने हिसार जिले के सातरोड़ गाँव के अकाल सहायता केन्द्र का दौरा किया तथा हरियाणा के अकाल पीड़ितों की सहायता की अपील की। हरियाणा से लगभग 398 अधिकारी तथा 2317 सैनिक आजाद हिन्द फौज में शामिल हुए।
स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भूमिका
- हरियाणा की महिला नेत्रियों में अरुणा आसफ अली व सुचेता कृपालानी का नाम गर्व से लिया जाता है। अरुणा आसफ अली का जन्म 16 जुलाई 1908 ई. को कालका में हुआ। भारत छोड़ो आंदोलन में बढ़-चढ़कर भाग लिया व पूरे भारत में महिलाओं का नेतृत्व किया; ग्वालिया टैंक मैदान (मुम्बई) में पहली महिला रहीं जिन्होंने राष्ट्र ध्वज फहराया। 1997 (HBSE के अनुसार 1994) ई. में इन्हें ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया।
- सुचेता कृपालानी का जन्म 25 जून, 1908 ई. को अम्बाला में हुआ। आजादी के बाद ये स्वतन्त्र भारत में उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।
- इनके अतिरिक्त रोहतक की कस्तूरी बाई, अंबाला की भाग देवी तथा विद्यावती, हिसार की चित्रा देवी, भिवानी की मोहिनी देवी, गुड़ग्राम की कमला देवी तथा सोनीपत की लीलावती ने भी विभिन्न राष्ट्रीय गतिविधियों में हिस्सा लिया — इनमें से कुछ जेल भी गईं।
देशी रियासतों में जन आन्दोलन
सन 1927 ई. में रियासतों में आंदोलन को दिशा देने हेतु ‘आल इण्डिया स्टेट पीपुल्स कॉन्फ्रेंस’ का गठन हुआ (पं. नेकीराम शर्मा, पं. हरिराम व रामजीलाल प्रमुख)। 1946 ई. में प्रजामण्डल ने हरियाणा की सभी रियासतों में आक्रामक आन्दोलन चलाया — किसानों ने कर देने से इंकार किया, शेष वर्गों ने शासन से असहयोग किया।
प्रमुख रियासतों में आंदोलन
- लोहारू रियासत — भिवानी जिले की छोटी रियासत। 1935 ई. में नवाब मिर्जा अमीनुद्दीन अहमद के कुशासन के विरुद्ध विरोध हुआ; नवाब ने सिंहाणी गाँव में शांतिपूर्ण भीड़ पर गोलियाँ चलवाईं, जिसमें 22 आदमी मारे गए। सूबेदार दिल सुख, ठाकुर भगवन्तसिंह, चौधरी मोहरसिंह आदि नेताओं ने स्वामी कर्मानन्द व स्वामी सच्चिदानन्द से मिलकर लोहारू में प्रजामण्डल स्थापित किया।
- जींद रियासत — प्रजामण्डल की नींव हंसराज रहबर, पं. देवीदयाल, बनारसीदास गुप्त तथा राजेन्द्र कुमार जैन ने रखी। अध्यक्ष श्री बनारसीदास थे; 1940 ई. में दादरी में डॉ. सत्यपाल की अध्यक्षता में प्रथम जनसभा हुई, विशेष अतिथि पं. नेकीराम शर्मा थे।
- पटियाला रियासत — आधुनिक महेन्द्रगढ़ जिले का नारनौल क्षेत्र इसके अन्तर्गत था।
- नाभा रियासत — आधुनिक महेन्द्रगढ़ जिले का अधिकांश भाग (बावल, कनीना, अटेली आदि) राजा प्रतापसिंह की रियासत में शामिल था। 1946 ई. के मध्य प्रतापसिंह ने प्रजामण्डल आन्दोलन कुचलने हेतु सभी नेताओं को गिरफ्तार किया — विरोध में जनता ने ‘नाभा वाले बावल छोड़ो’ आन्दोलन शुरू किया।
कैथल का विद्रोह
उत्तरी हरियाणा की सिख रियासतों में कैथल महत्वपूर्ण थी। 1763 में भाई गुरबख्शसिंह ने कैथल रियासत की नींव डाली। उत्तराधिकारी देसासिंह ने कैथल को अफगानों से मुक्त कराकर रियासत का मुख्यालय बनाया। 1803 में पुत्र लालसिंह ने अंग्रेजों की दासता स्वीकार कर ली; 1818 ई. में पुत्र प्रतापसिंह गद्दी पर बैठे। 1823 ई. में भाई उदयसिंह ने बागडोर संभाली; 1843 ई. में इनकी मृत्यु के बाद (पुत्र-विहीन होने से) अनरोली के शासक गुलाब सिंह ने रानी साहबकौर व विधवा रानी सूरजकौर को रियासत बचाए रखने हेतु प्रेरित किया।
23 मार्च, 1843 को अंग्रेजों ने प्रशासन तुरन्त सौंपने व रियासत के विलय का आदेश दिया, पर ऐसा नहीं हो पाया। 10 अप्रैल, 1843 को अंग्रेजों ने कैथल पर आक्रमण किया और 16 अप्रैल को किले-नगर पर अधिकार कर लिया। टेकसिंह — जिसने अंग्रेजों के विरुद्ध कार्यवाही संचालित की थी — चीका नामक स्थान पर पकड़ा गया और उसे आजीवन ‘काले पानी’ की सजा सुनाई गई।
कुंजपुरा का नवाब
कुंजपुरा का नवाब नजाबत खाँ अहमद शाह अब्दाली का समर्थक था — मराठों ने उसका वध कर दिया। अहमदशाह अब्दाली ने हरियाणा को दिल्ली राज्य रूहेला सरदार नजीबुद्दौल्ला को सौंप दिया (उस समय मुगल सम्राट ‘शाह आलम-II’ था)। 1770 में नजीबुद्दौला की मृत्यु बाद पुत्र जाबित खाँ को हिसार का उत्तराधिकारी बनाया गया। 1781 में ‘जींद के राजा गजपत सिंह’ ने सिखों और नफज खाँ के मध्य संधि कराई।
हरियाणा में महात्मा गांधी
- रौलट एक्ट (1919) का जायजा लेने महात्मा गांधी हरियाणा होते हुए पंजाब-लाहौर जा रहे थे — 9 अप्रैल 1919 (HSSC के अनुसार 10 अप्रैल 1919) को उनकी हरियाणा में पहली गिरफ्तारी पलवल रेलवे स्टेशन से हुई।
- महात्मा गाँधी प्रथम बार भिवानी में शौकत अली, मौलाना अबुल कलाम, स्वामी सत्यदेव व कस्तूरबा गांधी के साथ अम्बाला डिविजन कांफ्रेंस में 22-10-1920 को मुख्य अतिथि रूप में आए (अध्यक्षता लाला मुरलीधरन ने की; इसी सभा में ‘शैतान’ शब्द प्रयोग किया)।
- 15 फरवरी 1921 में दूसरी बार गांधी जी हरियाणा रूरल कॉन्फ्रेंस हेतु भिवानी आए (अध्यक्षता लाला लाजपत राय)। 16 फरवरी 1921 को सर्वप्रथम रोहतक में कलानौर आए। 17 फरवरी 1921 को (मौलाना आजाद के साथ) वैश्य हाई स्कूल व कॉलेज की नींव रखी।
- 8 मार्च 1921 में अम्बाला में कहा कि यह हरियाणा में उनका आखरी भ्रमण है। 2 दिसम्बर 1947 को दूसरी बार रोहतक आए और लोगों को पाकिस्तान पलायन से रोका। 9 दिसम्बर 1947 को पानीपत आए और वहाँ भी लोगों को रोका। 20 दिसम्बर 1947 को नूह/मेवात के घासेड़ा गाँव (गाँधी गाँव) में जनसभा को सम्बोधित किया।
- 1938 में सुभाष चन्द्र बोस ने पलवल में महात्मा गाँधी के नाम से संग्रहालय बनवाया। 15 नवम्बर 1949 को महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को अम्बाला जेल में फाँसी दी गई थी।
हरियाणा राज्य का गठन
- 1757-58 में हरियाणा मराठों के अधीन आ गया था और 1803 में सुर्जी अर्जन गाँव की संधि के बाद अंग्रेजों के अधीन आ गया। 1805 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने हरियाणा को 2 भागों में विभाजित किया; हरियाणा पूर्ण रूप से अंग्रेजों के अधीन 1809-10 में आया।
- अंग्रेजों से पहले हरियाणा पर मुगलों का प्रशासन था। 1832 में इसे ब्रिटिश भारत के तत्कालीन उत्तर-पश्चिमी प्रांतों में स्थानांतरित किया गया और 1858 में हरियाणा पंजाब का हिस्सा बन गया। 1966 से पहले हरियाणा का क्षेत्र पूर्वी पंजाब का हिस्सा था।
- जैसे ही 1911 में दिल्ली को भारत की राजधानी घोषित किया गया, हरियाणा के लोगों ने पंजाब से अलग कर दिल्ली में मिलाने की मांग शुरू कर दी। 1920 के दशक में दिल्ली में बदलाव हेतु मुस्लिम लीग और क्षेत्र के लोगों ने दिल्ली आयुक्त सर जे.पी. थॉमसन को सुझाव दिए।
- मुस्लिम लीग की 1925-26 की नई दिल्ली बैठक में स्वागत समिति अध्यक्ष पीरजादा मोहम्मद हुसैन ने हरियाणा को पंजाब से निकालकर दिल्ली में मिलाने की बात रखी। 1928 में दिल्ली सर्वदलीय सम्मेलन ने फिर सीमा-विस्तार की मांग की; पंडित श्रीराम शर्मा, देश बंधु गुप्ता और नेकी राम शर्मा ने महात्मा गांधी से यही आग्रह किया।
- अलग राज्य आंदोलन का नेतृत्व लाला लाजपत राय और अरुणा आसफ अली के साथ-साथ नेकी राम शर्मा ने किया, जिन्होंने स्वायत्त राज्य की अवधारणा विकसित करने हेतु एक समिति का नेतृत्व किया।
- 1931 के दूसरे गोलमेज सम्मेलन में पंजाब की ओर से सर जोफरी कार्बेट ने हरियाणा को पंजाब से निकालने की बात कही। दीनबंधु ने 9 सितम्बर 1932 को हरियाणा को अलग राज्य बनाने की बात कही। देशबंधु गुप्ता ने कहा — “हिंदी भाषी क्षेत्र कभी पंजाब का हिस्सा नहीं रहा; इसे पंजाब से अलग कर दिल्ली-राजस्थान के आसपास के हिस्सों से जोड़कर नया राज्य बनाया जाए”।
- 1935 में कांग्रेस के आदेश पर पूरे हरियाणा में कांग्रेस की स्वर्ण जयंती मनाई गई। आजादी के कुछ साल बाद से भाषाई आधार पर अलग राज्य की मांग उठने लगी।
- 1946 में कांग्रेस अध्यक्ष डॉ. पट्टाभि सीतारमैया ने ‘अखिल भारतीय भाषाई कॉन्फ्रेंस (दिल्ली)’ में अलग हरियाणा प्रदेश की मांग उचित ठहराई।
- 1948 में मास्टर तारा सिंह ने पंजाबी सूबे की मांग की। भाषा-विवाद बढ़ने पर पंजाब के मुख्यमंत्री भीमसेन सच्चर को सच्चर फॉर्मूला बनाना पड़ा — गठन 1 अक्टूबर 1949 को हुआ; इसने हरियाणा को भाषा-आधार पर दो हिस्सों में बाँटा, पर यह फार्मूला असफल रहा।
भारत सरकार ने विवाद समाप्त करने हेतु 1953 में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया। आयोग अध्यक्ष फजल अली ने 1955 में रिपोर्ट सौंपी, जिसके तहत 1956 में 7वें संवैधानिक संशोधन से 14 राज्यों व 6 केंद्रशासित प्रदेशों के पुनर्गठन की मोहर लगी — जिसमें पंजाब राज्य का पुनर्गठन भी शामिल था। 1956 में क्षेत्रीय फार्मूला लागू हुआ, जिसमें हरियाणा-पंजाब के बीच चंडीगढ़ विवाद-क्षेत्र का फार्मूला लगाया गया — चंडीगढ़ पर हरियाणा का 40% और पंजाब का 60% हक है। फतेह सिंह ने पंजाबी सूबे हेतु सरकार को अल्टीमेटम देकर आमरण अनशन की घोषणा की थी।
हरियाणा की तत्कालीन शासन-व्यवस्था व आगे की प्रशासनिक संरचना की पूरी जानकारी हरियाणा की राजनीति में पढ़ें।
पंजाब पुनर्गठन एक्ट (Punjab Reorganization Act)
- 23 सितम्बर 1965 को सरदार हुकम सिंह आयोग का गठन हुआ; 23 अप्रैल 1966 को इसके अंतर्गत शाह आयोग (सीमा आयोग) बना। सीमा आयोग ने 31 मई 1966 को रिपोर्ट सौंपी — इसमें तीन सदस्य थे: जे.सी. शाह (जयंतीलाल छोटेलाल शाह), एस. दत्त और एम.एम. फिलिप्स।
- पंजाब पुनर्गठन बिल 18 सितम्बर 1966 को पारित हुआ। 18वें संवैधानिक संशोधन के तहत हरियाणा भारत का 17वाँ राज्य बना; इसे पंजाब का 35.18% हिस्सा दिया गया।
- 1 नवम्बर 1966 को हरियाणा बनने के समय 7 जिले थे — सबसे बड़ा हिसार (13891 वर्ग किमी) और सबसे छोटा जींद (2702 वर्ग किमी)। सात जिलों के नाम — हिसार, जींद, महेंद्रगढ़, अम्बाला, रोहतक, गुरुग्राम और करनाल।
- 1947 की आजादी के समय हरियाणा में केवल 5 जिले थे — गुड़ग्राम, अम्बाला, करनाल, रोहतक, हिसार। 1948 में 6वाँ जिला महेंद्रगढ़ बना; 1966 में 7वाँ जिला जींद बना। 1967 में जींद और सफीदों को जींद की तहसील बनाया गया।
नोट — हरियाणा का गठन संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत किया गया था।
अनुच्छेद 3 — संसद को अधिकार
- किसी राज्य से क्षेत्र अलग करके या दो/अधिक राज्यों को मिलाकर नए राज्य का निर्माण कर सकेगी।
- किसी राज्य के क्षेत्र को बढ़ा सकती है।
- किसी राज्य का क्षेत्र घटा सकेगी।
- किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सकेगी।
- किसी राज्य के नाम में परिवर्तन कर सकेगी।
हरियाणा के 23 जिलों की स्थापना
| जिला | क्षेत्रफल (वर्ग किमी.) | स्थापना तिथि |
|---|---|---|
| हिसार | 2633.24 | 1 नवम्बर 1966 |
| गुरुग्राम | 1258 | 1 नवम्बर 1966 |
| रोहतक | 1745 | 1 नवम्बर 1966 |
| जींद | 2702 | 1 नवम्बर 1966 |
| अम्बाला | 1569 | 1 नवम्बर 1966 |
| महेंद्रगढ़ | 1899 | 1 नवम्बर 1966 |
| करनाल | 2520 | 1 नवम्बर 1966 |
| सोनीपत | 2260 | 22 दिसम्बर 1972 |
| भिवानी | 3283 | 22 दिसम्बर 1972 |
| कुरुक्षेत्र | 1530 | 23 जनवरी 1973 |
| सिरसा | 4277 | 26 अगस्त 1975 / 1 सितम्बर 1975 |
| फरीदाबाद | 741 / 742.9 | 15/2 अगस्त 1979 |
| कैथल | 2317 | 1 नवम्बर 1989 |
| रेवाड़ी | 1559 | 1 नवम्बर 1989 |
| यमुनानगर | 1756 | 1 नवम्बर 1989 |
| पानीपत | 1268 | 1 नवम्बर 1989, पुनः 1 जनवरी 1992 |
| पंचकुला | 898 | 15 अगस्त 1995 |
| झज्जर | 1834 | 15 जुलाई 1997 |
| फतेहाबाद | 2538 | 15 जुलाई 1997 |
| नूंह (मेवात) | 1507 | 4 अप्रैल 2005 |
| पलवल | 1359 | 13/15 अगस्त 2008 |
| चरखी दादरी | 1370.11 | 1 दिसम्बर 2016 |
| हांसी | 1349.76 | 19/22 दिसम्बर 2025 |
- अधिक क्षेत्रफल वाले जिले — सिरसा (4277), भिवानी (3283), जींद (2702)।
- कम क्षेत्रफल वाले जिले — फरीदाबाद (741), पंचकुला (898), गुरुग्राम (1258), पानीपत (1268)।
हरियाणा के जिलों का नामकरण और उपनाम
प्रत्येक जिले, शहर व गाँव की गहराई से जानकारी और वर्तमान प्रोफ़ाइल के लिए हरियाणा के 23 जिलों का परिचय ज़रूर देखें। यहाँ नीचे नामकरण व उपनाम से जुड़े ऐतिहासिक तथ्य दिए गए हैं।
जिलों के नामकरण का आधार
| जिला | नामकरण का आधार |
|---|---|
| भिवानी | राजा नीम सिंह तंवर की पत्नी भानी देवी के नाम पर |
| सिरसा | शाश्वत ऋषि / शिरिषकम के पेड़ के नाम पर |
| पलवल | पलम्बासुर राक्षस की राजधानी |
| महेंद्रगढ़ | 1861 में राजा नरेन्दर सिंह ने अपने बेटे महेन्द्र के नाम पर शहर का नाम रखा |
| रोहतक | तारावती के पुत्र रोहताश के नाम पर / रोहिडे के पेड़ के कारण नाम रखा |
| जींद | जयंती देवी के नाम पर पड़ा |
| अम्बाला | अम्बालिका के नाम पर / आम अधिक होने के कारण |
| फरीदाबाद | बाबा फरीद के नाम पर पड़ा |
| रेवाड़ी | रेवती के नाम पर पड़ा |
| दादरी | दादुर शब्द के कारण, जिसका अर्थ होता है मेंढक |
| चण्डीगढ़ | चण्डी मंदिर के नाम पर पड़ा |
| सोनीपत | श्रवण कुमार के नाम पर / अर्जुन के 13वें वंशज सोनी के नाम पर भी कहा जाता है |
| कैथल | हनुमान जी की जन्म स्थली |
| पंचकुला | पांच कूप या पांच झरनों के नाम पर |
| यमुनानगर | यमुना के किनारे स्थित होने के कारण |
| कुरुक्षेत्र | राजा कुरु के नाम पर पड़ा |
| करनाल | कर्ण के नाम पर पड़ा |
| फतेहाबाद | फिरोज शाह तुगलक के बेटे फतेह खां के नाम पर पड़ा |
| गुरुग्राम | गुरु द्रोणाचार्य के नाम पर पड़ा |
| झज्जर | छज्जू नामक किसान के नाम पर पड़ा |
| पानीपत | पाणिनि ऋषि के नाम पर पड़ा |
शहरों के उपनाम
| शहर | उपनाम |
|---|---|
| हिसार | स्टील सिटी, इस्पात नगरी, मैग्नेट सिटी |
| जींद | हरियाणा का हृदय, जयंती नगरी, दूध नगरी |
| सिरसा | सरस्वती नगरी, संतों की नगरी, वन नगरी |
| अम्बाला | मिक्सी सिटी, उपकरणों का शहर, साइंटिफिक सिटी/विज्ञान नगरी |
| पंचकुला | नदियों का शहर, नैनो सिटी |
| यमुनानगर | पेपर सिटी, मछुआरों का स्वर्ग, सुगर सिटी |
| फतेहाबाद | पिंक सिटी, गुलाबी नगरी, महलों का शहर |
| करनाल | हरियाणा का पेरिस, कर्ण नगरी, शूज सिटी, धान का कटोरा, हरियाणा का आधुनिक शहर |
| कुरुक्षेत्र | धर्मनगरी, वैदिक सभ्यता का पालन, सिटी ऑफ पार्क, गीता स्थली, धर्मराज नगरी, पवित्र शहर, संग्राहलयों का शहर |
| भिवानी | हरियाणा की काशी, मंदिरों का शहर, मिनी क्यूबा, वेक्स नगरी, सिटी ऑफ वार हीरोज, बॉक्सिंग का पॉवर हाउस |
| रोहतक | सुगर सिटी, पुरानी फिल्म सिटी |
| सोनीपत | एजुकेशन सिटी, साइकिल सिटी, गोल्डन सिटी, सोन नगरी, स्वर्ण प्रस्थ |
| रेवाड़ी | पीतल नगरी (ब्रास सिटी), अहिरवाल का लन्दन, वीरों का शहर, भारत का इजराइल |
| कैथल | छोटी काशी (नवग्रह के कुंडों के कारण), हनुमंत नगरी, कपिल स्थल, गुरुद्वारों की नगरी |
| पानीपत | बुनकरों का शहर, युद्धों का अखाड़ा, पेट्रोकेमिकल हब, हैंडलूम का शहर, कास्ट ऑफ कॉटन |
| झज्जर | शहीदों का शहर |
| मेवात | संत फकीरों की नगरी |
| गुरुग्राम | हरियाणा की आर्थिक राजधानी, मेडिसिटी, सौर ऊर्जा का हब, मनोरंजन का हब, कॉल सेंटर कैपिटल, सपनों का शहर (ड्रीम सिटी), इलेक्ट्रॉनिक नगरी, साइबर सिटी, गुरुद्रोण की नगरी |
| महेंद्रगढ़ | खनिजों का शहर |
| पलवल | कॉटन सिटी, सुगर सिटी |
| फरीदाबाद | उद्योग नगरी, नहरों का शहर, बाबा फरीद की नगरी |
| टोहाना | मुगल का द्वीप |
| थानेसर | शाहीदों का गाँव |
| शाहबाद | हॉकी का गढ़ |
| यादवेंद्र उद्यान | उत्तर भारत का नंदन वन |
| सुल्तानपुर झील | पक्षियों का स्वर्ग |
| पेहोवा | हरियाणा का गया |
| पांडु-पिंडारा | लघु हरिद्वार |
| हथिनीकुण्ड | मछुआरों का स्वर्ग |
| ट्राई-सिटी | पंचकुला-चंडीगढ़-मोहाली |
| नारनौल | बीरबल नगरी, बावड़ियों का शहर, सिंहों का शहर, तालाबों का शहर |
| बहादुरगढ़ | गेटवे ऑफ हरियाणा |
| भीमा देवी मंदिर | उत्तर भारत का खजुराहो |
| छछरोली | हरियाणा की चेरापूंजी |
| हांसी | ग्रीन सिटी, सूफी नगरी |
हरियाणा के नगर व उनके संस्थापक
| नगर | संस्थापक |
|---|---|
| रेवाड़ी | राजा रेवत / कर्मपाल |
| पानीपत | महाराजा दण्ड पति |
| फतेहाबाद | फिरोज शाह तुगलक (1351-52) |
| हांसी | आसाराम जाट |
| गोहाना | पृथ्वीराज चौहान (सोनीपत) |
| भिवानी | महाराजा नीम सिंह तंवर |
| जींद | पांडवों द्वारा जयंती देवी मंदिर बनाया गया |
| फरीदाबाद | बाबा शेख फरीद (1607) |
| रोहतक | राजा रोहताश (भ्रम) |
| दादरी | राजपूत बिल्हन सिंह (14वीं शताब्दी में) |
| अम्बाला | अम्बा राजपूत (14वीं शताब्दी में) |
| हिसार | फिरोज तुगलक (1354 ई. में) |
| झज्जर | छज्जू जाट |
| सिरसा | सैरिस ऋषि द्वारा / सरस राजा |
| कैथल | कपिल मुनि / बंदर अधिक होने से नाम पड़ा |
| हरनी खेड़ा | फिरोज शाह तुर्गलक (सिरसा) |
शहर व उनके पुराने नाम
| वर्तमान नाम | पुराना नाम |
|---|---|
| फतेहाबाद | इकदार |
| पेहवा | पृथुदक |
| रानियां | रजबपूर |
| कालका | कालकुट |
| कैथल | कपिलस्थल |
| रोहतक | रोहतिका |
| रेवाड़ी | रेवावाड़ी |
| बिलासपुर | व्यासपुर |
| नारनौल | नरराष्ट्र / नंदीग्राम |
| ऐलनाबाद | खड़ियाल |
| दादरी | दादुर |
| बूड़िया | संकू/श्राधनासूप |
| महम | महेस्थ |
| हिसार | इसुकार, फिरोजा-ए-हिसार |
| हरनी खेड़ा | फिरोजाबाद |
| महेंद्रगढ़ | कानौड़ |
| यमुनानगर | अब्दुलापुर |
| कुरुक्षेत्र | कुरु जनपद / बहुधान्यक / श्री कंठ जनपद |
| गुड़गाँव | गुरुग्राम |
| सिरसा | सैरिसक/सिरसिका |
| सफीदों | सर्पदमन |
| संदौरा | साधुराह |
| लोहारू | लोहारूप |
| हांसी | आशी/असि |
| असंध | असिन्धवत |
| बहादुरगढ़ | शराफाबाद |
| अग्रोहा | अग्रोदक |
| जींद | जयंतपूरी |
| पलवल | अपलवा |
| जगाधरी | युगन्धर |
| सोनीपत | सोनप्रस्थ |
| नौरंगाबाद | प्रकृतनाक |
| पिंजौर | पंचमपूरम/विराजनगर |
| गोहाना | गवन-मोहाना/गोकंठ |
| टोहाना | ताशायल |
| सुहण | श्रहन |
गाँव के बदले गए नाम
| पुराना नाम | वर्तमान नाम |
|---|---|
| मरोडा | ट्रम्प (नूह) |
| चमार खेड़ा | सुन्दर खेड़ा (हिसार) |
| चामखेड़ा | देवनगर (महेन्द्रगढ़) |
| मुस्तफाबाद | सरस्वती नगर (यमुनानगर) |
| खिज्राबाद | प्रताप नगर (यमुनानगर) |
| रांगडान | राजपूताना (करनाल) |
| लंडोरा | जयरामपुर (यमुनानगर) |
| झिमरी | खेड़ा जौली (करनाल) |
| अमीन गाँव | अभिमन्यु (कुरुक्षेत्र) |
| लल्ला अहीर | कृष्ण नगर (रेवाड़ी) |
| भोंडसी | भुवनेश्वरी ग्राम (गुरुग्राम) |
| बल्लभगढ | बलरामगढ |
| दुर्जनपुर | सज्जनपुर (भिवानी) |
| गढ़ी सांपला | चौधरी छोटूराम नगर (रोहतक) |
| पिंडारा पाण्डु | पिंडारा (जीन्द) |
| किन्नर गाँव | गैबी नगर (हांसी) |
| कुत्ताबाढ | प्यार नगर (हिसार) |
| कुतियावाली | शाहजादापुर (हिसार) |
| गंदा गाँव | अजीत नगर (फतेहाबाद) |
| सधार सष्टा | बाबा भूमनशाह नगर (सिरसा) |
| बाबरपुर | नानकपुर (पानीपत) |
| बिलासपुर | व्यासपुर (यमुनानगर) |
| मोहम्मदाबाद | प्रेमनगर (सोनीपत) |
| चुहड़पुर | चांदपुर (जींद) |
| मोहम्मदपुर माजरा | बिरहड़ माजरा (झज्जर) |
| गन्दा खेडा | गुरुकुल खेडा (जींद) |
| अकबरपुर नांगल | नांगल हरनाथ (महेंद्रगढ़) |
| मोहम्मदाबाद | प्रेमसुख नगर (सोनीपत) |
| धनाना अलादादपुर | शिवनगरी (सोनीपत) |
हरियाणा के राजकीय प्रतीक
| प्रतीक | नाम |
|---|---|
| राजकीय वृक्ष | पीपल / बौद्धि वृक्ष / पवित्र वृक्ष / अंजीर (फाईकस रिलिगिओसा) |
| राजकीय खेल | कुश्ती |
| राजकीय पवित्र नदी | सरस्वती |
| राजकीय पक्षी | काला तीतर (ब्लैक फ्रंकोलिनस) |
| राजकीय पशु | काला हिरण / कृष्ण मृग (एंटीलोप सर्वाईकैप्रा) |
| राजकीय फूल | कमल (निलम्बो न्यूसिफेरा) |
| राजकीय त्योहार | हरियाली तीज |
| राजकीय फल | आम (मेंगीफेरा इंडिका) |
| राजकीय मिठाई | जलेबी |
| राजकीय उपन्यास | झाडूफिरी (राजा राम शास्त्री) |
| राजकीय हास्य कवि | सुरेन्द्र शर्मा |
| राजकीय हास्य व्यंग्य कवि | मीर जाफर जेठाली |
| राजकीय नृत्य | सांग |
| राजकीय गीत | जय जय जय हरियाणा |
| राजकीय हिंदी कवि | उदय भानु हंस |
| दूसरा राजकीय हिंदी कवि | खुशी राम शर्मा |
| राजकीय उर्दू कवि | अनूपचंद आफताप |
| राजकीय भाषा | हिंदी |
| राजकीय सांगी | धर्मवीर भंगाना (हिसार) |
नोट — अगर विकल्पों में काला हिरण न हो तो राजकीय पशु नीलगाय (बोसलाफस ट्रेगोकामेलस) मानी जाती है।
हरियाणा की जनगणना
- भारत में जनगणना हर 10 वर्ष बाद होती है, जो भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा (अनुच्छेद 246 के तहत) करवाई जाती है। जनगणना संघ सूची का विषय है।
- हरियाणा में प्रथम बार जनगणना वर्ष 1971 में हुई थी; अब तक 5 बार जनगणना हुई है। 1966 में हरियाणा के गठन के समय साक्षरता दर 20 प्रतिशत थी।
- हरियाणा की आबादी वर्ष 2001 की जनगणना से 2011 में 19.90 प्रतिशत बढ़ गई। 2011 की जनगणना के अनुसार कुल गाँव — 6,841 (नोट — वर्तमान में कुल गाँवों की संख्या 7,356 हो चुकी है)। 2011 की जनगणना के अनुसार ग्राम पंचायत — 6,212। कुल जनसंख्या — 2,53,51,462 (25.35 मिलियन); वर्तमान संभावित आबादी 2.80 करोड़।
जनसंख्या के प्रमुख आंकड़े
- पुरुष जनसंख्या — 1,34,94,734; महिला जनसंख्या — 1,18,56,728।
- जन्म दर — 24.3 (प्रति हजार); मृत्यु दर — 6.3 (प्रति हजार)।
- सर्वाधिक जनसंख्या वाले जिले — फरीदाबाद (18 लाख), भिवानी (16.3 लाख), गुरुग्राम (15.1 लाख), करनाल (15 लाख)।
- सबसे कम जनसंख्या वाले जिले — हांसी (5.4 लाख), पंचकुला (5.6 लाख), रेवाड़ी (9 लाख), महेंद्रगढ़ (9.2 लाख), फतेहाबाद (9.4 लाख)। (2011 जनगणना के अनुसार)
- 0-6 वर्ष आयु में सर्वाधिक जनसंख्या वाला जिला — मेवात। इसी आयु-वर्ग में सबसे कम जनसंख्या वाले जिले — गुरुग्राम, सोनीपत।
- सबसे अधिक पुरुष/महिला जनसंख्या वाला जिला — फरीदाबाद; सबसे कम पुरुष/महिला जनसंख्या वाला जिला — हांसी।
- अधिक शहरीकृत जिला — फरीदाबाद; कम शहरीकृत जिला — मेवात।
- ग्रामीण आबादी — 65.13 प्रतिशत (1,65,09,359); शहरी आबादी — 34.87 प्रतिशत (88,42,103)।
जनसंख्या घनत्व एवं वृद्धि
- हरियाणा का जनसंख्या घनत्व 573 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर है। सबसे कम घनत्व सिरसा (303 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी) का है; सबसे अधिक घनत्व फरीदाबाद (2442 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी) में है।
- हरियाणा की जनसंख्या वृद्धि 19.90 प्रतिशत है (2001 की जनसंख्या के सापेक्ष)। सबसे अधिक जनसंख्या-वृद्धि वाला जिला गुरुग्राम (73.14%) है; सबसे कम जनसंख्या-वृद्धि वाला जिला झज्जर (8.90%) है।
साक्षरता
- वर्तमान हरियाणा की साक्षरता दर 75.55 प्रतिशत है — पुरुष साक्षरता दर 84.06 प्रतिशत, महिला साक्षरता दर 65.94 प्रतिशत।
- सर्वोच्च साक्षरता दर वाला जिला — गुरुग्राम (84.70 प्रतिशत)। न्यूनतम साक्षरता दर वाला जिला — मेवात (56.1 प्रतिशत)।
- अधिकतम पुरुष साक्षरता दर वाला जिला — रेवाड़ी (91.44 प्रतिशत)।
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जब हरियाणा को “बहुधान्यक” कहा जाता था
प्राचीन समय में इस क्षेत्र को ब्रह्मवर्त, आर्यवर्त और ब्रह्म प्रदेश जैसे नामों से जाना जाता था। महाभारत काल में तो इसकी पहचान ही अलग थी — यहाँ अनाज इतनी भरपूर मात्रा में पैदा होता था कि इसे “बहुधान्यक” यानी प्रचुर धन-धान्य की भूमि कहा गया। रोहतक के बोहर गाँव से मिले एक शिलालेख के अनुसार इसे “हरियंक” के नाम से भी जाना जाता था, और 1337 विक्रम संवत के एक शिलालेख में पहली बार “हरियाणा” शब्द खुद अंकित मिलता है।
दिलचस्प बात ये है कि विद्वानों के बीच “हरियाणा” नाम की उत्पत्ति को लेकर भी मतभेद रहे हैं — कोई इसे “हरि” (भगवान विष्णु) से जोड़ता है, तो कोई “हरियाल” या “अभिरयाणा” जैसे नामों से इसकी व्याख्या करता है। ऋग्वेद, वामन पुराण और पाणिनि की अष्टाध्यायी जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी इस क्षेत्र — थानेसर, कुरुक्षेत्र, कैथल, सिरसा — का उल्लेख मिलता है, जो बताता है कि यह भूमि सभ्यता के शुरुआती दौर से ही आबाद और समृद्ध रही है।
हड़प्पा से भी पुरानी बस्तियाँ
हरियाणा की सबसे रोमांचक खोजों में से एक है हांसी का राखीगढ़ी। यहाँ मिली सभ्यता को धौलावीरा के बाद हड़प्पा सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा स्थल माना जाता है, और यहाँ से मिले 5,000 से 7,000 साल पुराने मानव कंकाल इस बात की गवाही देते हैं कि यहाँ जीवन कितनी सदियों पहले से बस रहा था। इसी तरह फतेहाबाद का कुणाल और भिरड़ाना — भिरड़ाना को तो सिंधु घाटी सभ्यता का अब तक खोजा गया सबसे प्राचीन स्थल माना जाता है — यह साबित करते हैं कि हरियाणा प्री-हड़प्पा काल से ही मानव सभ्यता का एक जीवंत केंद्र था।
रोहतक का मिताथल, बनावली, भगवानपुर, और कैथल का बालू जैसे कई स्थलों से मिट्टी के बर्तन, आभूषण, चूड़ियाँ और औजार आज भी इस बात की कहानी सुनाते हैं कि हजारों साल पहले यहाँ के लोग कैसे जीवन जीते थे।
जब कुरुक्षेत्र की धरती पर महाभारत रचा गया
हरियाणा की पहचान महाभारत से अलग करके नहीं देखी जा सकती। कहा जाता है कि पांडवों ने यहीं पांच नगर बसाए थे — पांडुप्रस्थ (आज का पानीपत), सोनप्रस्थ (सोनीपत), इंद्रप्रस्थ (दिल्ली), बाग्प्रस्थ और तिलप्रस्थ (फरीदाबाद)। कुरुक्षेत्र का ब्रह्मसरोवर वही स्थान माना जाता है जहाँ युद्ध के दौरान दुर्योधन छिपा था, और यहीं कहीं श्रीकृष्ण ने अर्जुन को वह उपदेश दिया जो आगे चलकर श्रीमद्भगवद्गीता के नाम से पूरी दुनिया में जाना गया।
गणराज्यों का दौर
महाभारत के बाद हरियाणा में गणतांत्रिक व्यवस्थाओं का दौर आया। यौधेय गण, जिनकी राजधानी रोहतक मानी जाती है, ने कुषाणों को इस क्षेत्र से बाहर खदेड़ा था। अग्रोहा में अग्र गण का शासन था, तो नारायणगढ़-करनाल क्षेत्र में कुणिद गण फला-फूला। महेंद्रगढ़-रेवाड़ी-नारनौल के इलाकों में अर्जुनायन गण का प्रभाव रहा। इन गणराज्यों के सिक्के आज भी हमें इनके अस्तित्व की पुख्ता गवाही देते हैं।
हर्षवर्धन — थानेसर का वह सम्राट जिसकी चर्चा चीन तक पहुँची
छठी-सातवीं सदी में पुष्यभूति वंश (जिसे वर्धन वंश भी कहा जाता है) का उदय हुआ, और इसी वंश में जन्मा वह शासक जिसने हरियाणा को इतिहास के पन्नों पर हमेशा के लिए दर्ज कर दिया — हर्षवर्धन। थानेसर में जन्मे हर्षवर्धन ने अपने शासनकाल के शुरुआती वर्षों में पांच प्रदेशों — पंजाब, कन्नौज, बिहार, बंगाल और उड़ीसा — को जीतकर अपने राज्य में मिलाया।
उनके दरबार में लंबे समय तक रहा चीनी यात्री ह्वेनसांग, जिसे “यात्रियों का राजकुमार” कहा जाता है, अपनी किताब “सी-यू-की” में हर्ष कालीन भारत का बड़ा ही जीवंत वर्णन छोड़ गया। हर्षवर्धन खुद भी एक विद्वान थे — उन्होंने प्रियदर्शिका, रत्नावली और नागानंद जैसी रचनाएँ लिखीं, और उनके दरबारी कवि बाणभट्ट ने हर्षचरित की रचना की।
तोमर, चौहान और वह योद्धा जिसे “राय पिथौरा” कहा गया
हर्षवर्धन के बाद गुर्जर प्रतिहार, फिर तोमर वंश का शासन रहा। हांसी उस दौर का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना रहा। लेकिन इस कालखंड की सबसे चर्चित कहानी है चौहान वंश की, और खासकर पृथ्वीराज चौहान की — जिन्हें “अजमेर का शेर” और “राय पिथौरा” के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने बिना किसी हथियार के एक शेर को मार गिराया था।
करनाल के पास स्थित तरावड़ी (तराईन) की धरती ने दो ऐतिहासिक युद्ध देखे — पहले युद्ध (1191) में पृथ्वीराज चौहान विजयी रहे, लेकिन दूसरे युद्ध (1192) में मोहम्मद गौरी ने धोखे से उन्हें हरा दिया। यहीं से भारत में दिल्ली सल्तनत के एक नए दौर की शुरुआत हुई।
सल्तनत काल — गुलाम वंश से लेकर लोदी वंश तक
गौरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुलाम वंश की नींव रखी। इसी दौर में रजिया सुल्तान — भारत की पहली मुस्लिम महिला शासिका — का इतिहास कैथल की धरती से जुड़ा है, जहाँ आज भी उनका मकबरा मौजूद है। आगे चलकर बलबन ने हांसी के इक्तेदार के रूप में शुरुआत करके दिल्ली की गद्दी संभाली।
खिलजी और तुगलक वंश के दौर में हरियाणा ने कई बड़े निर्माण देखे — फिरोजशाह तुगलक ने फतेहाबाद और हिसार जैसे शहर बसाए, नहरों का जाल बिछाया, और गुजरी महल जैसी इमारतें खड़ी कीं। इसी दौर में मध्य एशिया के लुटेरे तैमूर ने भी हरियाणा के सिरसा-फतेहाबाद क्षेत्र को तबाह किया। बाद में लोदी वंश के अंतिम शासक इब्राहिम लोदी की किस्मत का फैसला भी हरियाणा की धरती — पानीपत — में ही हुआ।
पानीपत — वह मैदान जिसने तीन बार भारत का इतिहास बदला
शायद ही दुनिया में कोई और जगह हो जिसने एक ही धरती पर तीन बार इतने बड़े साम्राज्यों का भाग्य तय होते देखा हो। 1526 में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर मुगल साम्राज्य की नींव रखी। 1556 में अकबर की सेना ने हेमचंद्र विक्रमादित्य (हेमू) को हराया — वही हेमू, जो रेवाड़ी के एक साधारण परिवार से निकलकर 22 युद्ध जीतते हुए दिल्ली के सिंहासन तक पहुँचा था, लेकिन एक तीर की चोट ने उसकी किस्मत पलट दी। और 1761 में अहमदशाह अब्दाली और मराठों के बीच हुए तीसरे युद्ध ने मराठा शक्ति को बुरी तरह हिला दिया।
इसी मुगलकालीन दौर में हरियाणा ने शेरशाह सूरी, हसन खाँ मेवाती की वीरगति, बंदा सिंह बहादुर के संघर्ष, और आखिर में आयरिश साहसी जॉर्ज थॉमस की कहानी भी देखी, जिसने हांसी को अपनी राजधानी बनाकर एक समय अपने ही सिक्के तक चलाए।
जब अंग्रेजों की हुकूमत आई और विद्रोह की चिंगारी उठी
1803 में सुर्जी-अर्जुनगाँव की संधि के बाद हरियाणा धीरे-धीरे अंग्रेजों के अधीन आता गया। लेकिन यहाँ के लोगों ने चुपचाप गुलामी स्वीकार नहीं की — जींद, रानियाँ, छछरोली, कैथल और लाडवा जैसी रियासतों में समय-समय पर विद्रोह होते रहे।
फिर आया 1857 — वह साल जब पूरे हरियाणा में क्रांति की आग भड़क उठी। अंबाला, गुड़गाँव, हांसी, हिसार, रोहतक, रेवाड़ी, सिरसा — हर जगह से वीरों ने हथियार उठाए। रेवाड़ी के राव तुलाराम को तो आज भी हरियाणा में 1857 की क्रांति का हीरो माना जाता है, जिन्होंने अंग्रेजों से डटकर मुकाबला किया और अंत में मदद की तलाश में विदेश तक की यात्रा की। बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह को धोखे से पकड़कर दिल्ली की चांदनी चौक पर फांसी दी गई। रोहतक में 159 और गुड़गाँव में 228 क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाई गई थी — यह आंकड़े खुद बताते हैं कि यहाँ के लोगों ने आज़ादी की लड़ाई में कितनी कीमत चुकाई।
आज़ादी की लड़ाई में हरियाणा का योगदान
1857 के बाद भी हरियाणा राष्ट्रीय आंदोलन में पीछे नहीं रहा। लाला लाजपत राय, लाला मुरलीधर, चौधरी छोटूराम, अरुणा आसफ अली और सुचेता कृपलानी जैसे नामों ने न सिर्फ हरियाणा बल्कि पूरे भारत के स्वतंत्रता संग्राम को दिशा दी। महात्मा गांधी कई बार हरियाणा आए — पलवल रेलवे स्टेशन पर उनकी पहली गिरफ्तारी हुई थी, और भिवानी, रोहतक व अंबाला में उन्होंने बड़ी-बड़ी सभाएं भी कीं। असहयोग आंदोलन हो, साइमन कमीशन का विरोध हो, या भारत छोड़ो आंदोलन — हरियाणा के हर जिले ने अपनी भागीदारी दर्ज कराई।
पंजाब से अलग होकर बना अपना राज्य
आज़ादी के बाद भी हरियाणा को अपनी अलग पहचान के लिए लंबा इंतज़ार करना पड़ा। भाषा के आधार पर पंजाब से अलग राज्य बनाने की मांग दशकों तक चलती रही — 1911 में दिल्ली को राजधानी बनाए जाने के बाद से ही यह आवाज़ उठनी शुरू हो गई थी, और लाला लाजपत राय, आसफ अली, नेकी राम शर्मा जैसे नेताओं ने इस मांग को मजबूती दी।
आखिरकार लंबे संघर्ष, सच्चर फॉर्मूले की असफलता, और सीमा आयोग की रिपोर्ट के बाद 1 नवंबर 1966 को हरियाणा भारत का 17वाँ राज्य बनकर अस्तित्व में आया — शुरुआत में सिर्फ 7 जिलों के साथ (हिसार, जींद, महेंद्रगढ़, अंबाला, रोहतक, गुड़गाँव और करनाल)। समय के साथ नए-नए जिले बनते गए, और सबसे नया अध्याय जुड़ा 19 दिसंबर 2025 को, जब हांसी हरियाणा का 23वाँ जिला बना।
एक राज्य, अनगिनत कहानियाँ
हरियाणा का इतिहास सिर्फ राजाओं और युद्धों की सूची नहीं है — यह उन गाँवों की कहानी है जिनके नाम सदियों में बदलते गए, उन रियासतों की कहानी है जिन्होंने अपनी पहचान बचाने के लिए संघर्ष किया, और उन आम लोगों की कहानी है जिन्होंने हर दौर में इस धरती को जिंदा रखा। जब आप अगली बार हरियाणा के किसी जिले, किसी गाँव या किसी मेले के बारे में पढ़ें, तो याद रखिए — उसके पीछे हजारों साल का एक सफर छिपा है।
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