ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन (British East India Company Rule)

By Reacher

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1803 ई. में मराठों (दौलत राव सिंधिया) और ब्रिटिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के बीच सुर्जिअर्जन गाँव की संधि हुई थी।

हरियाणा क्षेत्र को अंग्रेजों ने 1805 में प्रशासनिक सुविधा के लिए दो भागों में बांट दिया था। एक नियंत्रण जो अंग्रेजों के अधीन रहा जिसमें पानीपत, सोनीपत, पालमपुर, नूँह, हथीन, सोहना, पलवल तथा रेवाड़ी शामिल थे।

दूसरा शेष बचा हुआ क्षेत्र उन सामंतों एवं सरदारों को दिया गया जिन्होंने आंग्ल-मराठा युद्ध में अंग्रेजों की सहायता की थी। राव तेजसिंह को रेवाड़ी का शेष भाग। अहमद बख्शा को रोहतक, हिसार, लाहौर व फिरोजपुर-झिरका का क्षेत्र।

हांसी की बेगम समरू को करनाल व गुड़गाँव के कुछ गाँव। मुहम्मद अली खाँ को पलवल का शेष भाग पुराने शासकों को बल्लभगढ़, जींद, थानेसर आदि क्षेत्र दिए गए। इस प्रकार अंग्रेजों के शासन से लोग संतुष्ट नहीं हुए और अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष किए जाने लगे।

अम्बाला, कुरुक्षेत्र व करनाल में राजपूतों, सैनियों और सिक्खों ने, रोहतक में जाटों तथा रांघडो ने एवं गुड़गाँव में मेवों, अहीरों तथा गुर्जरों ने और हिसार में भड़ियों, रांघडो व बिश्नोइयों ने अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष किए।

1809-10 में अंग्रेजों ने वो क्षेत्र उन सामंतों एवं सरदारों से छीन लिया जो उन्हें दिया गया था इसके बाद अलग-अलग रियासत के राजाओं ने अंग्रेजों का विरोध करना शुरू किया जो निम्न प्रकार से किया गया –

हरियाणा के विद्रोह

⦿ 1814 में जींद का विद्रोह प्रताप सिंह ने किया था।
⦿ 1818 में रानियाँ (सिरसा) का विद्रोह जाबित खान ने किया था।
⦿ 1818 में छछरोली (यमुनानगर) का विद्रोह राजा जोधा सिंह ने किया था।
⦿ 1824 में किसान विद्रोह में हिसार, रोहतक और गुड़गाँव के किसानों ने किया था।
⦿ 1835 में बनावली (फतेहाबाद) का विद्रोह गुलाब सिंह ने किया था।
⦿ 1843 में कैथल का विद्रोह गुलाब सिंह और साहिब कौर ने मिल कर किया था।
⦿ 1845 में लाडवा (कुरुक्षेत्र) का विद्रोह अजीत सिंह ने किया था।
⦿ 1849 में सिखो ने अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह किया था।

लाडवा का विद्रोह

वर्ष 1743 में सरदार सिंह ने उत्तरी हरियाणा में ‘लाडवा रियासत’ की स्थापना की थी। लाडवा का पहला विद्रोह (1805) लाडवा के शासक गुरदीत सिंह ने स्थानीय लोगों और थानेसर के शासक की मदद से अंग्रेजी सेनापति कर्नल बर्न से युद्ध किया। 1803 ई. में और उसके बाद लाडवा रियासत के तत्कालीन शासक गुरदत्त सिंह ने अंग्रेजों को खूब परेशान किया था। गुरदत्त सिंह का उत्तराधिकारी उसका पुत्र अजीतसिंह हुआ।

लाडवाँ का दूसरा विद्रोह – 1845 ई. में अंग्रेजों ने राजा अजीत सिंह को ‘विद्रोही’ घोषित कर सहारनपुर में रखा। प्रथम आंग्ल-सिख युद्ध (1845-46) में अजीतसिंह जेल से मुक्त (फरार) हो गया। 1846 में अजीतसिंह ने लुधियाना पर हमला कर दिया तथा छावनी को जलाकर राख कर दिया।

जींद का विद्रोह

1763 ई. में जींद रियासत की नींव फूल मिसल के एक सरदार स्वरूप सिंह द्वारा रखी गई थी। 1813 में जींद रियासत के तत्कालीन शासक भागसिंह को लकवा मार जाने के कारण शासन चलाने में असमर्थ हो गया। 1814 को भागसिंह के पुत्र प्रतापसिंह ने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

गुड़गाँव व हिसार में कृषक विद्रोह

1824 ई. में किसानों ने कंपनी की शोषणकारी सरकार को हमेशा के लिए समाप्त करने का संकल्प लिया। रोहतक की साहसी जाटों द्वारा विद्रोह की शुरुआत करने के साथ ही गुड़ग्राम और हिसार जिलों के असंख्य लोग आंदोलन में कूद पड़े। 1824 में बर्मा के युद्ध में अंग्रेजों की पराजय का लाभ उठाकर रोहतक, हिसार व गुड़गाँव के कृषकों ने बैंकों में लूट-पाट की। बाद में राजा सूरजमल ने विद्रोहियों के साथ मिलकर युद्ध किया लेकिन अंग्रेज जीत गए।


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