रोमिला थापर के अनुसार महाभारत का युद्ध 900 ईस्वी पूर्व लड़ा गया था। हरियाणा को महाभारत में बहुधान्यक के रूप में उल्लेख किया गया है। बहुधान्यक का अर्थ है भरपूर मात्रा में अनाज और प्रचुर धन की भूमि। महाभारत के द्रोण पर्व में यौधेय गणराज्य का उल्लेख मिलता है।
महाभारत के प्रसिद्ध नकुल दिग्विजय में राज्य के तीन दुर्गों का वर्णन किया गया है।
पांडवों ने युद्ध में सफल होने के लिए जयंती देवी मंदिर का निर्माण करवाया था। (जयंती देवी पांडवों की कुल देवी के रूप में जानी जाती है) पांडवों ने अपने पूर्वजों का पिंडदान पांडू पिंडारा जींद में किया था।
ब्रह्म सरोवर वह स्थान माना जाता है जहाँ दुर्योधन युद्ध के समय पानी में छुपा था।
महाभारत का मूल नाम जय संहिता था, इस का नाम वेद व्यास ने रखा था, शुरुआत में इसमें केवल 8,800 श्लोक थे बाद में कई कहानियों को जोड़कर पुस्तक के श्लोकों की संख्या बढ़ाकर 100,000 कर दी गई।
गीता में कुल 18 अध्याय और 700 श्लोक हैं। गीता को हिन्द धर्म का एक पवित्र ग्रंथ माना जाता है। गीता में आत्मा, परमात्मा, भक्ति, कर्म, जीवन आदि का वर्णन है। गीता का दूसरा नाम गीतोपनिषद है।
पांडवों द्वारा स्थापित पांच प्रस्थ
⦿ पांडुप्रस्थ (वर्तमान पानीपत)
⦿ सोनप्रस्त (वर्तमान सोनीपत)
⦿ इंद्रप्रस्थ (वर्तमान दिल्ली)
⦿ बाग्प्रस्त (वर्तमान उतरप्रदेश में)
⦿ तिलप्रस्थ – (वर्तमान में फरीदाबाद)
महाभारत के 18 पर्वों का संक्षिप्त विवरण
1) आदि पर्व – इस पर्व में पांडव और कौरवों के पालन पोषण का जिक्र है।
2) सभा पर्व – इस पर्व में कौरवों और पांडवों के बीच जो पासे का खेल हुआ था उसी के बारे में विस्तार से बताया गया है।
3) वन पर्व – पाँचो पांडव और द्रौपदी ने कमाक्ष अरण्य की ओर प्रस्थान किया। इस अध्याय में पांडवों ने जो समय अरण्य में बिताया उसके बारे में बताया गया है।
4) विराट पर्व – इस अध्याय में पांडवों को 13 वर्ष तक अपनी पत्नी द्रौपदी के साथ अपनी पहचान को छुपा कर रहना था।
5) उद्योग पर्व – 13 वर्षों के बाद पांडव वापस हस्तिनापुर लौटे और उन्होंने अपना अधिकार मांगा तो दुर्योधन ने उन्हें साफ मना कर दिया। इस पर्व में इसी का वर्णन विस्तार पूर्वक बताया गया है।
6) भीष्म पर्व – (इसी पर्व में प्रसिद्ध गीता का उपदेश है) कौरवों और पांडवों के बीच में युद्ध छिड़ चुका था और भीष्म ने कौरवों की ओर से सेनापति के रूप में कमान संभाली थी। (युद्ध के दसवें दिन भीष्म तीरों की शय्या पर लेटे)
7) द्रोण पर्व – भीष्म के बाद गुरु द्रोण ने युद्ध की कमान संभाली थी।
8) कर्ण पर्व – गुरु द्रोण के बाद कर्ण ने युद्ध कि कमान संभाली। 17वें दिन कर्ण की मृत्यु हुई।
9) शल्य पर्व – कर्ण के बाद शल्य ने युद्ध की कमान संभाली।
10) सौप्तिक पर्व – कौरवों के युद्ध में हारने के बाद द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा ने प्रतिशोध लेना चाहा। वह पांडवों को मारना चाहता था लेकिन उनकी जगह पांडवों के पुत्रों की मृत्यु हो गई।
11) स्त्री पर्व – युद्ध में कई औरतों ने अपने पतियों को खोया था। पांडवों ने उन सभी स्त्रियों के पतियों की आत्मा की शांति की कामना की।
12) शांति पर्व – धर्मराज युधिष्ठिर ने राजा बनने के बाद अपने मन की शांति खो दी थी। तब भीष्म पितामह ने उनका मार्गदर्शन किया था।
13) अनुशासन पर्व – भीष्म पितामह ने और भी उपदेश दिए यहां इसी के बारे में बताया गया है।
14) अश्वमेध पर्व – युधिष्ठिर ने अश्वमेध यज्ञ किया था। इस पर्व में इसी संबंध में बताया गया है।
15) आश्रमवासिका पर्व – धृतराष्ट्र और उनकी पत्नी गांधारी ने कुंती के साथ वन की ओर प्रस्थान किया।
16) मौसल पर्व – यादव के वंश का एक श्राप की वजह से नाश हो गया। इस पर्व में इसी का जिक्र है।
17) महाप्रस्थानिका पर्व – श्री कृष्ण की मृत्यु के समाचार को सुनकर पांडवों ने द्रोपदी के साथ मेरु पर्वत की ओर प्रस्थान किया और उनके पीछे कुत्ता भी चल रहा था। अंत में केवल युधिष्ठिर और वह कुत्ता ही जीवित बचा।
18) स्वर्ग आरोहण पर्व – जब युधिष्ठिर की मृत्यु हुई तो उसे नरक के रास्ते पर ले जाया गया लेकिन अंत में वह स्वर्ग पहुंच गए और वहां उसके रिश्तेदार मौजूद थे।
