राखीगढ़ी (हांसी)
राखीगढ़ी हरियाणा के हांसी जिले में स्थित है। यह 2 गाँव राखी और खास में फैले हुए हड़प्पा/सरस्वती सिन्धु सभ्यता है। यह सरस्वती की सहायक नदी दृषद्वती (जिसे आज चौटांग कहते है) के पास बसी सभ्यता थी।
राखीगढ़ी भारतीय क्षेत्रों में धोलावीरा के बाद दूसरा विशालतम नगर है। इस स्थल की खोज वर्ष 1963 में की गई थी इसके पहली बार उत्खनन का कार्य 1969 में सूरजभान के द्वारा किया गया था।
राखीगढ़ी का उत्खनन व्यापक पैमाने पर 1997-1998 और 1999-2000 ई. के दौरान अमरेन्द्र नाथ ने किया था। राखीगढ़ी से प्राक्-हड़प्पा एवं परिपक्व हड़प्पा युग के प्रमाण मिले हैं।
राखीगढ़ी से एक नर कंकाल मिला है, जिसके सर और पैरों के पास मिट्टी के बर्तन मिले है। कंकाल लगभग 5000 से 7000 साल पुराना है। यहाँ से बहुत मात्रा में मिट्टी की चूड़िया मिली है। यह स्थल लगभग 350 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ से खुदाई में पत्थर और लोहे से बने हथियार भी मिले हैं।
राखीगढ़ी की खुदाई में तरह-तरह की आकृति के मिट्टी के खिलौने मिले हैं। राखीगढ़ी विश्व विरासत स्थलों में 2012 की रिपोर्ट के अनुसार ‘खतरे में एशिया के विरासत 10 स्थल’ में शामिल किया गया है 2022 में राखीगढ़ी से एक नवजात शिशु का कंकाल और आभूषण की फैक्ट्री मिली है।
कुणाल (फतेहाबाद)
यह स्थल वैदिक काल की सरस्वती नदी के पास स्थित है। कुणाल की खुदाई में प्री-हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेष मिले हैं, जो 6000 साल पूर्व के है। यह सभ्यता अब तक की सबसे पुरानी सभ्यता हो सकती है।
कुणाल की खुदाई हरियाणा सरकार के पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग के श्री जे. एस.. खत्री और श्री एम. आचार्य ने की थी 1985 में कुणाल की खुदाई का काम शुरू हुआ था।
कुणाल से दो मुकुट, हथियार, चुड़ियों और चांदी के हार, 6 सोने के मोती और अर्ध कीमती पत्थरों के 12,000 से अधिक सूक्ष्म मोती मिले हैं। यहां 24 कैरेट सोने के हार व चांदी के मुकुट भी मिले है।
यहां पर आभूषण पिघलाने की भट्ठी भी मिली है। जिससे यह स्पष्ट लग रहा है कि लोग आभूषण ढालने का काम किसी भट्ठी द्वारा करते थे। खुदाई में आभूषण, चुड़ियां, मणके व गोलाकार घर भी मिले हैं।
भिरड़ाना (फतेहाबाद)
यह सिंधु घाटी सभ्यता का अब तक खोजा गया सबसे प्राचीन स्थल है। 2003-04 में किए गए उत्खनन में इस नगर की खोज हुई थी।
भिरड़ाना से नृत्यकी की नक़्ल जो बर्तन पर उकेरी हुई मिली है। इस से पहले मोहनजोदड़ो से एक नर्तकी की मूर्ति प्राप्त है, जो कांस्य की थी।
बनावली (फतेहाबाद)
बनावली की खोज रविन्द्र सिंह बिष्ट द्वारा सन 1973-74 में की गई थी। यहाँ से मिट्टी के हल मिले हैं। एस-आकार के जार, खाना पकाने के बर्तन, ओवन, तंदूर, चित्रित मिट्टी के बर्तन आदि। चित्रित रूपांकनों में शामिल हैं- मोर, पीपल के पत्ते, पेड़, हिरण, तारा, मछली, फूल, चौराहे, चेकर बोर्ड पैटर्न, शहद कंघी पैटर्न।
हड़प्पा की मुहरों में गैंडे, जंगली बकरी, बाघ के शरीर वाले मिश्रित जानवर के चित्र हैं। मिट्टी के बर्तन मिले हैं, वे हड़प्पा के मिट्टी के बर्तनों के साथ तुलनीय हैं और मिट्टी के बर्तनों के संयोजन कालीबंगा के संयोजन के समान है।
मिताथल
यह स्थल भिवानी जिले में स्थित है। मिताथल की खुदाई सूरजभान के द्वारा सन 1968-73 और 1980-86 के बीच की गई थी।
यहाँ से पूर्व हड़प्पा और हड़प्पा संस्कृति का सबूत मिला है। इसे स्वर्गीय सीसवाल सभ्यता भी कहते हैं। इसे हड़प्पा सभ्यता का पूर्वी डोमेन कहा जाता है।
नौरंगाबाद गाँव के पास 2001 में प्रारंभिक खुदाई में सिक्कों, उपकरण, खिलौने, मूर्तियों और बर्तनों को 2,500 साल पुरानी कलाकृतियों का पता चला।
भगवानपुर
यह कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी के पास बसा हुआ हड़प्पा सभ्यता का स्थल है। इसकी खुदाई का कार्य सन 1975-76 में J.P. जोशी ने किया था।
भगवानपुर से कूबड़ वाले बैल के आकार का कोरेलियन लटकन, टेराकोटा मोती और अर्ध-कीमती पत्थर खोज में शामिल हैं।
सांपला (रोहतक)
सांपला में वर्ष 2021 में खुदाई के दौरान हड़प्पा कालीन मानव कंकाल के अवशेष मिले हैं।
पुरातत्व विभाग की टीम ने बताया कि मानव कंकाल करीब 3500 साल पुराना है। यह कंकाल किसी महिला का है। कंकाल के साथ मिले अवशेष हड़प्पा सभ्यता के समय के हैं।
फरमाणा खास (दक्ष-खेड़ा)
फरमाणा खास रोहतक जिले में स्थित है। हरियाणा में ज्ञात पुरास्थलों में राखीगढ़ी के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा पुरास्थल है। यहां सेलखेड़ी से बनी चार हड़प्पा कालीन मोहरें भी प्राप्त हुई हैं। यहां हड़प्पा सभ्यता कालीन कब्रिस्तान भी मिला है।
गिरावड (रोहतक)
यह गाँव रोहतक जिले में स्थित है इस स्थान की खोज 2006 में दयानंद विश्वविद्यालय के विवेक डांगी ने की थी। उत्खनन के दौरान यहां से 13 गर्त निवास प्राप्त हुए। यहां मृदभांड पकाने के लिए दो भट्टियां प्राप्त हुई हैं।
बालू (कैथल)
इस स्थल की खोज सन 1977 में डॉ. सूरजभान तथा डॉ. जिम जे. शेफर (अमेरिका) ने की थी इस पर उत्खनन कार्य डॉ. उदयवीर सिंह तथा डॉ. सूरजभान ने 1979 में किया था। यहां से प्रारंभिक हड़प्पा संस्कृति, हड़प्पा सभ्यता और उत्तर हड़प्पा संस्कृति के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ से लहसुन के अवशेष प्राप्त हुए हैं।
मदीना
यह गाँव रोहतक जिले में स्थित है। इसका उत्खनन सन 2007-2008 में डॉ. मनमोहन कुमार के नेतृत्व में किया गया।
उत्खनन के दौरान भगवानपुरा की तरह उत्तराखंड हड़प्पा संस्कृति तथा चित्रित धूसर मृदभांड संस्कृति के लोगों के साथ-साथ रहने के प्रमाण मिले हैं।
सीसवाल
यह हिसार जिले में है इसकी खुदाई पंजाब विश्वविद्यालय के डॉ. सूरजभान द्वारा सन 1967 में की गई थी मिट्टी के बर्तन तथा ठिकरे अधिक मात्रा में मिले हैं। इनमें से काफी बर्तन हाथ से बने हुए हैं। यह सब बर्तन-भांडे कालीबंगा (राजस्थान) के स्थान से मिली सामग्री से एकदम मिलते जुलते हैं। यहाँ से मिट्टी की चित्रित चुड़ियां तथा मनके मिले हैं। तांबे के हत्थे वाले गंडासे की आकृति की एक वस्तु भी प्राप्त है। खेतड़ी (राजस्थान) के तांबे की खानों की समीपता के कारण यहां तांबे का प्रयोग होने लगा था।
