हरियाणा में मुगल वंश (1526-1857) — Mughal Dynasty

By Reacher

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हरियाणा के वीर मोहन सिंह मंढार

मोहन सिंह मंढार का सम्बन्ध हरियाणा के कैथल जिले से था। उसने अपने गाँव को घेरने वाले बाबर के भेजे हुए मुगलों को भारी क्षति पहुंचाई। अपने लोगों को बचाने के प्रयत्न में मोहन सिंह को कैद कर लिया गया। मोहन सिंह के साथ उन कैदियों को दिल्ली ले जाया गया।

बाबर ने इन्हें सज़ाए-मौत का फरमान सुनाया पर साथ-साथ यह भी कहा कि यदि वे इस्लाम कबूल लेते हैं तो उनकी सजा माफ कर दी जायेगी। इस्लाम स्वीकार न करने पर मोहन सिंह को मौत के घाट उतार दिया गया।

हसन खाँ मेवाती

16 मार्च, 1527 ई. को हसन खां ने राणा सांगा के साथ मिलकर ‘खानवा’ के मैदान में बाबर से लोहा लिया। मगर इसी दौरान एक तोप का गोला हसन खाँ मेवाती के सीने पर आ लगा और इस प्रकार हसन खाँ मेवाती युद्ध में देश पर वीरगति को प्राप्त हुए।

शेरशाह सूरी

शेरशाह सूरी नारनौल के रहने वाले थे। उसके मन में मुगलों के प्रति घृणा का भाव था। उसने 1539 ई. में चौसा तथा 1540 ई. में कन्नौज/बिलग्राम के युद्धों में हुमायूँ को पराजित करके हिन्दुस्तान छोड़ने पर विवश कर दिया। उसके प्रयासों से ही मुगल 1540 ई. से 1555 ई. अर्थात् 15 वर्ष तक हिन्दुस्तान के मानचित्र से गायब रहे। हुमायूँ को हराने के बाद शेरशाह को रायसिन, मारवाड़ एवं कालिंजर के राजपूत शासकों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा।

कालिंजर के युद्ध में बारूद फटने से 22 मई, 1545 ई. को शेरशाह की मृत्यु हो गई। उसने 1540 ई. से 1545 ई. तक शासन किया। अपने शासनकाल में उसने सड़कें और सराएं बनवाई तथा मुद्रा एवं डाक व्यवस्था में कई सुधार किए और भूमि कर व्यवस्था में भी कई सुधार किए।

22 मई, 1545 ई. को शेरशाह की मृत्यु के बाद उसके पुत्र इस्लामशाह ने गद्दी सभाली। 1552 ई. में इस्लामशाह की मृत्यु के बाद उसके बारह वर्षीय पुत्र को शासक बनाया गया लेकिन तीन दिन बाद ही उसकी हत्या कर आदिल शाह ने शासन की बागडोर सभाल ली।

हेमचन्द्र विक्रमादित्य

पानीपत की दूसरी लड़ाई के प्रमुख नायक हेमचन्द्र विक्रमादित्य लगभग तीन शताब्दियों के पश्चात् दिल्ली पर मुस्लिम शासन के बाद एकमात्र अन्तिम हिन्दू राजा थे जो सोलहवीं शताब्दी में दिल्ली के सिंहासन पर बैठे। उन्होंने अपने जीवन में 22 युद्ध जीतकर, देश की एकता व अखण्डता को कायम रखने के लिए जीवनभर भरसक प्रयत्न करते हुए, अपने जीवन का बलिदान दिया।

अकबर के दरबारी अबुल फज़ल ने भी अपनी पुस्तक ‘अकबरनामा में हेमू की प्रशंसा की है। हेमचन्द्र विक्रमादित्य का जन्म राजस्थान के अलवर के पास माछेरी गाँव में 1501 ई. (विक्रमी सम्वत् 1558) में सन्त पूर्णदास के घर हुआ था।

हेमू का परिवार कुछ समय बाद रेवाड़ी के कुतुबपुर में आकर बस गया था यहीं आकर हेमू ने संस्कृत, हिन्दी, फारसी तथा अरबी की शिक्षा प्राप्त की। उन्हें बचपन से ही कुश्ती और घुड़सवारी का शौक था। उन दिनों रेवाड़ी एक बड़ा व्यापारिक केन्द्र था तथा इराक-ईरान के व्यापारियों के लिए यह प्रमुख मण्डी थी।

हेमू ने बारूद बनाने वाले प्रमुख तत्व ‘शोरे’ का व्यापार शुरू किया तथा शेरशाह सूरी को बारूद की आपूर्ति करने में अहम भूमिका निभाई।

आखिर 7 अक्टूबर, 1556 ई. को भारतीय इतिहास का वह विजय दिवस आया जब दिल्ली के सिंहासन पर सैंकड़ों वर्षों की गुलामी के बाद हिन्दू साम्राज्य की स्थापना हुई। दिल्ली के पुराने किले में वैदिक रीति से हेमू का राज्याभिषेक हुआ। लगातार युद्ध जीतने के कारण उन्हें ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि दी गई थी।

पानीपत की दूसरी लड़ाई

5 नवम्बर, 1556 ई. को हेमू को समाचार मिला कि मुगल सेना पानीपत के मैदान में पहुँच चुकी है तो हेमू ने भी अपनी पूरी सेना के साथ पानीपत के मैदान में पहुँचकर मुगल सेना को तीन ओर से घेर कर पूरी ताकत से आक्रमण किया।

हेमू अपने प्रिय हाथी ‘हवाई’ पर सवार होकर शत्रु को ललकारता हुआ सैनिकों का मनोबल बढ़ा रहा था। अकबर को इस युद्ध में, पानीपत से आठ मील दूर सुरक्षित स्थान पर रखा गया था।

हेमू के एक तीर बायीं आँख में लगा। हेमू बेहोश होकर हाथी के हौदे में गिर पड़ा। तथा अपने सेनापति को न देखकर सेना में भगदड़ मच गई। हेमू की विजय, पराजय में बदल चुकी थी। इस प्रकार, एक तीर ने भारतभूमि पर मुगल सत्ता के उखड़े हुए पाँव फिर से जमा दिए थे। हेमू को बन्दी बनाकर अकबर के सामने लाया गया तथा उसका सिर धड़ से अलग कर दिया गया।

अकबर ने गाजी (काफिरों को मारने वाला) की उपाधि धारण की। हेमू का कटा हुआ सिर काबुल के दिल्ली दरवाजे पर तथा धड़ दिल्ली के पुराने किले के बाहर लटका दिया गया ताकि लोगों के दिलों मे डर पैदा हो। बैरम खाँ ने विरोधियों की सामूहिक हत्या का आदेश दिया। हेमू के रिश्तेदार व करीबी अफगान समर्थकों को मौत के घाट उतार दिया गया। गाँव सौंदापुर (पानीपत) में हेमू का स्मृति स्थल है। हेमचन्द्र विक्रमादित्य ने अपने जीवन में 22 युद्ध जीते एवं 29 दिन तक दिल्ली पर सुशासन किया।

बंदा सिंह बहादुर का संघर्ष

उन्होंने औरंगजेब की मृत्यु से उत्पन्न अराजकता की स्थिति का लाभ उठाया। 1709 ई. में हरियाणा में सोनीपत के निकट सेहरी खाण्डा नामक स्थान पर डेरा लगाया। सेहरी खाण्डा में स्थापित बंदा बहादुर की प्रतिमा बनाई गई है। बंदा सिंह बहादुर ने प्रशासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए बाज सिंह को सरहिंद, फतेह सिंह को समाना तथा विनोद सिंह व राम सिंह को थानेसर का सूबेदार बनाया। बाबा बंदा सिंह बहादुर ने 1708 ई. में हरियाणा के सोनीपत में सेहरी खांडा को अपना प्रमुख केन्द्र बनाया।

पानीपत का तृतीय युद्ध

14 जनवरी 1761 को सदाशिव राव भाऊ तथा अहमदशाह अब्दाली के मध्य युद्ध हुआ। कड़े संघर्ष के बाद युद्ध में मराठों की हार हुई। इस युद्ध में विश्वास राव, सदाशिव राव भाऊ, जसवंत राव, तंकोजी सिंधिया जैसे सरदार तथा लगभग 28000 सैनिक काम आए। मराठा इतिहासकार काशीराज पंडित के अनुसार, “पानीपत का तृतीय युद्ध मराठों के लिए प्रलयकारी सिद्ध हुआ”।

बालाजी बाजीराव इस पराजय को सहन नहीं कर सके तथा 23 जून 1761 को आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हुए।

जाट

जाट मध्य काल में दिल्ली के आस-पास, मथुरा, आगरा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा एवं पंजाब में निवास करते थे। ये मुख्यतः कृषि करते थे तथा बलिष्ठ शरीर एवं शौर्य से परिपूर्ण लोग थे। इन्होने महमूद गजनवी एवं उसके उत्तराधिकारियों से लोहा लिया।

मथुरा, आगरा के इन जाटों ने गोकुल के नेतृत्व में औरंगजेब के अत्याचारों के विरुद्ध 1669 ई. में भयंकर विद्रोह किया। विद्रोह को दबा दिया गया तथा गोकुल शहीद हुआ लेकिन इस विद्रोह तथा मुगलों के अत्याचारों ने जाटों को लगातार संघर्ष के लिए प्रेरित किया। गोकुल के बाद बृजराज, राजा राम, चूड़ामन, बदन सिंह व सूरजमल के नेतृत्व में यह संघर्ष जारी रहा। इस संघर्ष ने अन्य संघर्षों को जन्म दिया एवं मुगलों के पतन में मुख्य भूमिका निभाई।

तिलपत का प्रथम युद्ध (1669) – यह युद्ध गोकुला जाट तथा औरंगजेब के बीच हुआ था। इसमें गोकुला जाट पराजित हुआ।

तिलपत का दूसरा युद्ध (1764) – यह युद्ध नजीबुदौला और जाट राजा जवाहर सिंह के बीच हुआ था। इसमें नजीबुदौला की हार हुई।

सतनामी : सतनामी मध्ययुग के भक्ति आंदोलन की ही एक उपज थी सतनामी सम्प्रदाय की स्थापना नारनौल क्षेत्र के बिसेर गाँव में बीरभान नामक एक भक्त ने ‘साध’ के रूप में की। यह रैदासी सम्प्रदाय की ही एक शाखा थी मुगल सम्राट औरंगजेब के समय में 1672 ई. में नारनौल में सतनामियों ने विद्रोह किया था।

करनाल का युद्ध

यह युद्ध 24 फरवरी 1739 में नादिरशाह व मोहम्मद शाह रंगीला के बीच हुआ था। इस युद्ध में नादिर शाह विजयी रहा और नादिर शाह कोहिनूर का हीरा और मयूर सिंहासन लूट के ईरान चला गया। महाराव विक्टोरिया मेमोरियल हाल करनाल में है।

हरियाणा में जॉर्ज थॉमस

जॉर्ज थॉमस का जन्म आयरलैंड में हुआ था यह 1782 में भारत आया और 1787 में दिल्ली पंहुचा। सबसे पहले यह निजाम की सेना में तोपची बना फिर बाद में समरू बेगम की सेना में भर्ती हो गया। कहा जाता है, जॉर्ज समरू से बहुत ज्यादा प्यार करता था। परन्तु समरू बेगम ने अपनी गोद ली हुई बेटी की शादी जॉर्ज से करवा दी थी वर्तमान हरियाणा के गुरुग्राम जिले में समरू बेगम का महल है।

1793 में मेवात क्षेत्र के मराठा सुबेदार थे थॉमस को मेवात संभालने का अधिकार दिया और इससे खुश होकर मराठा सुबेदार ने झज्जर व पटौदी के कुछ गाँव भी थॉमस को दिया और धीरे-धीरे इसने रोहतक, गुड़गाँव, सोनीपत, भिवानी आदि के गाँवों को मिला लिया। तब उसने अपनी राजधानी ‘हाँसी’ को बनाया तथा वहाँ टकसाल की स्थापना की। इस टकसाल में उसके नाम से सिक्के ढाले जाते थे जिन्हें ‘सिक्का-ए-साहिब’ कहा जाता है।

जॉर्ज ने 1794 को झज्जर और बहादुरगढ़ को जी भर कर लूटा और 1797 में जॉर्ज ने अपनी राजधानी हांसी को बनाया। क्योंकि हांसी का किला एक सुरक्षित किला था। जॉर्ज थॉमस को पानी वाली जहाज चलाने का शोक था। इस प्रकार जॉर्ज ने हिसार में जहाजगढ़ कोठी बनाई। ध्यान रहे एक जहाजगढ़ नामक एक गाँव झज्जर में है जहाँ वर्तमान हरियाणा में सबसे बड़ा पशुओं का मेला भरता है। जोर्ज ने 1797-1802 तक राज किया।

भांडावास का युद्ध (1789) – यह रेवाड़ी में शाह आलम द्वितीय और उसके विद्रोही वजीर नजफ कुली खान के बीच हुआ। जॉर्ज, थॉमस शाह-आलम-द्वितीय की जान बचाकर समरू बेगम का विश्वास पात्र बना।

नारनौंद का युद्ध (1799) – यह सिखों और हांसी के शासक जॉर्ज थॉमस के बीच नारनौंद (हांसी) में हुआ जिसमें जॉर्ज थॉमस की विजय हुई।

काहनौर का विद्रोह (1796) – यह रांघड किसानों व हांसी के शासक जॉर्ज थॉमस के बीच हुआ। इसमें थॉमस की जीत हुई।

बेरी की प्रथम लड़ाई (1794) – यह लड़ाई जाटों और जॉर्ज थॉमस के मध्य हुई थी जिसमें जॉर्ज थॉमस को जीत प्राप्त हुई।

बेरी की दूसरी लड़ाई (1801) – यह लड़ाई जॉर्ज थॉमस और सिखों व मराठों की संयुक्त सेना के मध्य हुई जिसमें जॉर्ज, थॉमस की हार हुई थी।

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