हरियाणा एक प्राचीन नाम है। प्राचीन समय में इस क्षेत्र को ब्रह्मवर्त, आर्यवर्त और ब्रह्म प्रदेश के नाम से जाना जाता था महाभारत काल में हरियाणा को बहुत ज्यादा अनाज होने के कारण बहुधान्यक कहते थे। रोहतक जिले के बोहर गाँव से मिले शिलालेख के अनुसार, इस क्षेत्र को हरियंक के नाम से जाना जाता था। 1337 में विक्रम सम्वत में बलबन की अवधि के शिलालेख प्राप्त हुए है। जिसमें ‘हरियाणा शब्द अंकित है। धरणीधर अपने काव्य ‘अखण्ड प्रकाश’ में कहते हैं कि हरियाणा शब्द ‘हरिबंका’ से आता है। जो हरि की पूजा व भगवान इंद्र से जुड़ा हुआ है। संस्कृत में रचित ग्रन्थ अष्टाध्यायी, महाभाष्य, हर्षचरितम और राजतंरगिणी आदि में हरियाणा की ऐतिहासिक जानकारी मिलती है।
विद्वानों द्वारा हरियाणा को दिए गए विभिन्न नाम
⦿ डॉ. एच आर गुप्ता – आर्याना (आर्यों का घर)
⦿ यदुनाथ सरकार – हरियाल
⦿ महाराज कृष्ण – हरना (लूटपाट)
⦿ राहुल सांकृत्यायन – हरिधानव्या
⦿ डॉ. बुद्ध प्रकाश – अभिरयाणा
हरियाणा के इतिहास के स्रोत
ऋग्वेद : हरियाणा प्रदेश का वर्णन ऋग्वेद में ‘रज हरियाणे’ के रूप में मिलता है। ऋग्वेद में हरियाणा के थानेसर और हरियाणा की सरस्वती नदी का भी वर्णन मिलता है। ऋग्वेद से पता चलता है कि आर्य लोग सरस्वती और दृषदवती नदी के बीच में निवास करते थे। ऋग्वेद में भरत नामक कबीले का उल्लेख किया गया है, जो इस काल में सरस्वती और यमुना के बीच रहता था।
वामन पुराण : वामन पुराण में हरियाणा को कुरु जंगल कहते थे। और ब्रह्मसरोवर झील का वर्णन मिलता है। वामन पुराण में कहा गया है, कि राजा कुरु ने कुरुक्षेत्र स्थल में भगवान शिव के नंदी द्वारा खींचे गए (सुनहरे भूरे रंग के हल द्वारा) सात कोस के क्षेत्र को पुनः कृषि योग्य बनाया।
पाणिनि की अष्टाध्यायी : पाणिनि द्वारा लिखित पुस्तक अष्टाध्यायी में हरियाणा के अनेक क्षेत्र का वर्णन मिलता है। जैसे – सैरिसक (सिरसा), कपिस्थल (कैथल), कालकूट (कालका), ताशायल (टोहाना) और श्रहण (सुहण) आदि।
बाण भट्ट की हर्षचरित : बाण भट्ट की हर्षचरित्र किताब में हरियाणा को श्री कंठ जनपद कहा है। और थानेसर को स्थानेश्वर के नाम से जाना जाता था
जैन साहित्य : रामदेव के यशस्तिलक चंपू और पुष्ण दांत के जसहर चरिऊ दोनों ग्रंथों से जानकारी मिलती है, कि हरियाणा पशुधन में परिपूर्ण था चारों ओर लहराती फसलें और वर्ण आश्रम धर्म को मानने वाले लोग रहते थे।
जैन मूर्तियां : रानीला (दादरी) और हांसी से प्राप्त हुई है।
दिव्यदान : यह बौद्ध साहित्य का ग्रन्थ है, इसमें हरियाणा के रोहतक और अग्रोहा का उल्लेख मिलता है।
मज्झिमनिकाय ग्रन्थ : इस बौद्ध ग्रथ से हरियाणा की जन जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।
चुल्लवग्ग – इस से पता चलता है कि अग्रोहा बौद्ध धर्म का एक शक्तिशाली केंद्र था।
मंजू श्री मुल कल्प: इस ग्रंथ में श्रीकण्ठ जनपद के अंतर्गत आने वाले स्थान स्थानेश्वर का उल्लेख किया गया है और यहां के शासक वैश्य थे।
टोपरा अभिलेख : यह अम्बाला से प्राप्त हुआ है। इस से ज्ञात होता है कि हरियाणा कभी मौर्य साम्राज्य का भाग था। वही अभिलेख है जिसे फिरोजशाह तुगलक दिल्ली ले गया था। वर्तमान में टोपरा नामक स्थान यमुनानगर जिले में है। 11वीं शताब्दी के चौहान राजा विग्रहराज चतुर्थ के तीन अभिलेख भी टोपरा के स्तंभ पर अंकित हैं। जिनसे मलेच्छों पर विग्रहराज IV की विजय के संबंध में जानकारी मिलती है।
नोट : टोपरा से सात स्तम्भ लेख प्राप्त हुए (स्रोत HBSE – 6 ठी कक्षा हरियाणा का इतिहास)
प्रतिहार काल अभिलेख : राजा भोजराज के काल में यहाँ से दो अभिलेख मिले है। पेहवा और सिरसा का अभिलेख। पेहवा के अभिलेख से ज्ञात होता है कि पेहवा घोड़ो का व्यापारिक केंद्र था। और सिरसा से पता चलता है की यहाँ पाशुपत संप्रदाय था। एक अभिलेख पेहवा से महेंद पाल के समय का मिला है। जिसमें मंदिर के निर्माण का वर्णन किया गया है।
दिल्ली अभिलेख : पालम अभिलेख व दिल्ली अभिलेख : इस अभिलेख में 1328 ई. में हरियाणा को धरती का स्वर्ग कहा गया है। दिल्ली अभिलेख में दिल्ली को ढिल्लिका बताया गया है।
कुषाण सिक्के : हरियाणा में कभी कुषाणों का भी शासन था इस बात का पता खोखराकोट (रोहतक) और नौरंगाबाद (भिवानी) के सिक्कों से लगाया जा सकता है।
सोनीपत का ताम्रपत्र लेख – इससे पता चलता है कि हर्ष शैव धर्म को मानने वाला था।
राजतरंगिणी – कल्हण की पुस्तक राजतरंगिणी में रोहतक को एक व्यापारिक स्थल बताया गया है।
विदेशी स्रोत – हेवेनसांग ने हरियाणा के तीन स्थानों का भ्रमण किया है थानेसर, सुध और गोकंठ (गोहाना)।
हरियाणा से प्राप्त महत्वपर्ण अभिलेख
➤ अग्रोहा से प्राप्त अभिलेख में संगीत के सातों स्वरों का अंकन है। पशुपति सम्प्रदाय से संबंधित अभिलेख सिरसा से मिले है।
➤ लाडूनी अभिलेख नागौर (राजस्थान) से प्राप्त है। इस अभिलेख के अनुसार हरियाणा राज्य की राजधानी दिल्ली थी।
➤ कपालमोचन (यमुनानगर) स्थान से एक अधूरा अभिलेख मिला है।
➤ हिसार के गुर्जरी महल में एक स्तंभ पर 8 अभिलेख है, जो 8 जगह से आने वाले भागवतों की सूचना देते हैं।
➤ 2-4 सदी के तोशाम (भिवानी) से दो अभिलेख प्राप्त हुए हैं।
➤ एक अभिलेख अग्रोहा से प्राप्त हुआ है। इस अभिलेख में यौधेय गण की प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रकाश डाला गया है पृथ्वीराज-3 का अभिलेख हांसी से प्राप्त हुआ है।
➤ राजा हर्ष काल के सोनीपत में ताम्र सिक्के प्राप्त हुए है।
➤ बौद्ध धर्म का प्रमुख केन्द्र – सुघ (जगाधरी) बारहखड़ी लिखाई का सबसे प्राचीन अभिलेख सुध से ही मिला है। कई संगीतकारों के बैलगाड़ी में बैठे हुए की मूर्ति सुघ (जगाधरी) से ही मिली है।
➤ इंडो-ग्रीक सिक्के और योधेय कालीन साँचे रोहतक के खोखराकोट से प्राप्त हुए है।
➤ यक्ष-यक्षणी की मूर्तियाँ होडल, भादस, पलवल से प्राप्त हुई हैं। मिट्टी की मोहरें दौलतपुर से प्राप्त हुई है।
➤ मौर्यकालीन स्तूप व अवशेष हिसार व फतेहाबाद में मिले हैं। टकसालें बोहर माजरा, अग्रोहा व बरवाला में मिली है।
➤ यौधेय गणराज्य की मोहर भिवानी के नौरंगाबाद से प्राप्त हुई है।
➤ कुषाण कालीन सोने व ताम्बे के सिक्के और समुद्रगुप्तकालीन सिक्के भिवानी के मिताथल और जगाधरी से प्राप्त हुए है।
➤ सिक्के ढालने के साँचे खोखराकोट, बोहर माजरा और औरंगाबाद से प्राप्त हुए हैं। महात्मा बुद्ध की 2 सम्पूर्ण मूर्तियाँ नौरंगाबाद (भिवानी) से प्राप्त हुई है।
➤ सूर्य स्तंभ पर बनी मूर्ति अमीन गावं से प्राप्त हुई है। पंचमुखी शिव मूर्ति पेहवा से प्राप्त हुई है।
➤ अस्थल बोहर (रोहतक) से बलराम की मूर्ति प्राप्त हुई है।
➤ नचारखेड़ा (हिसार) से रामायण श्ओकांकित फलक और दौलतपुर (कुरुक्षेत्र) से मिट्टी की मोहरें प्राप्त हुई है।
