गुर्जर प्रतिहार वंश
हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद हरियाणा में अगला वंश गुर्जर प्रतिहार वंश था। हरियाणा में गुर्जर प्रतिहार वंश की शुरुआत नागभट्ट द्वितीय से मानी जाती है। नागभट्ट द्वितीय ने धर्मपाल को पराजित करके हरियाणा प्रदेश पर अधिकार किया था।
मिहिर भोज प्रथम 836 ईस्वी से 885 ई. तक राजा रहा। मिहिर भोज राजा के समय का पेहवा अभिलेख मिला है। यहां घोड़ों का एक बड़ा व्यापार केंद्र था जहां पर घोड़ों की खरीद-बेच होती थी। मिहिर भोज ने तीर्थ यात्रा करने का उद्देश्य किया और अपने राज्य का पूरा भार अपने पुत्र महेंद्र पाल को सौंप दिया महेंद्र पाल अगले राजा बने।
महेंद्र पाल मिहिर भोज के पुत्र थे जो कन्नौज की गद्दी पर बैठे महेंद्र पाल के समय का एक पेहवा अभिलेख मिला है। जिससे हमें उस समय के मंदिर निर्माण के बारे में जानकारी मिलती है।
हरियाणा में तोमर वंश
हरियाणा पर जब मोहम्मद गजनवी ने आक्रमण किया था। तो उस समय हरियाणा में तोमर वंश था। मोहम्मद गजनवी ने हरियाणा पर 2 बार आक्रमण किया था पहली बार 1009 ईस्वी में वह असफल रहा दूसरी बार 6 वर्ष बाद 1014 ईस्वी में सफल हुआ।
गजनवी ने हरियाणा में भारी लूटपाट मचाई और चक्र स्वामी (विष्णु) की प्रतिमा को नष्ट कर दिया। चक्र स्वामी महाराज को भगवान विष्णु कहा जाता था इस मूर्ति को उसने मक्का मदीना की सीढ़ियों पर लगा दिया। महमूद गजनबी को मूर्ति भंजक कहा जाता था। मोहम्मद गजनवी की मृत्यु के बाद उसके भतीजे मसूद ने हरियाणा पर आक्रमण किया।
1037 ईस्वी में जब हरियाणा पर आक्रमण किया तब हांसी के राजा कुमारपाल थे अनंगपाल द्वितीय (1051 से 1081) कुमार पाल तोमर की मृत्यु के बाद अनंगपाल द्वितीय तोमर गद्दी पर बैठा।
1043 ई. में मसूद के बेटे मादूद ने आक्रमण किया। तोमर शासक कुमारपाल देव ने अन्य शासकों की सहायता से मादूद को पराजित कर दिया।
प्रथम तुर्क आक्रमण के समय पंजाब में शाही वंश का शासक जयपाल शासन कर रहा था।
मादूद की मृत्यु के पश्चात् उसका उत्तराधिकारी इब्राहिम (1059-1109 ई.) ने हरियाणा पर पुनः आक्रमण किया। हरियाणा के तत्कालीन तोमर नरेश तेजपाल ने इब्राहिम के सम्मुख बिना लड़े ही घुटने टेक दिये और हरियाणा प्रदेश गजनी राज के अधीन हो गया।
हरियाणा में चौहान वंश
तोमर वंश की खराब हालत को देखकर अर्ण राज ने 1139 में हरियाणा पर आक्रमण कर दिया। इस राजवंश के संस्थापक का नाम राजा वासुदेव था।
विग्रहराज चतुर्थ चौहान वंश का एक शक्तिशाली शासक था। इन्होने ‘महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की तथा इन्होने दिल्ली पर कब्जा किया। जिसमें हरियाणा का प्रमुख रूप से हांसी का दुर्ग था।
चौहान वंश के महान एवं अन्तिम शासक पृथ्वीराज चौहान तृतीय (III) थे। जिन्होंने दिल्ली के आस-पास अपने पराक्रम से चौहान साम्राज्य की स्थापना की। पृथ्वीराज चौहान के महान होने को ‘राय पिथौरा’ भी कहा जाता है। इनका जन्म 1165 ई. में हुआ। यह अजमेर के शासक सोमेश्वर और कमला देवी के पुत्र थे।
पृथ्वीराज चौहान ने बिना किसी हथियार के शेर को मार गिराया जिसके कारण उसे ‘अजमेर का शेर’ भी कहा जाता है। इन्हें पृथ्वीराज तृतीय के नाम से भी जाना जाता था पृथ्वीराज चौहान को उनके पिता की मृत्यु के पश्चात 1178 ई. में तेरह वर्ष की आयु में अजमेर का शासक नियुक्त किया गया। इनकी बहादुरी एवं शौर्य से प्रभावित होकर इसके नाना (अनंगपाल) ने उसे दिल्ली के सिंहासन का उत्तराधिकारी भी घोषित किया।
पृथ्वीराज चौहान ने गद्दी पर बैठने के पश्चात साम्राज्य विस्तार की नीति अपनाते हुए 1182 ई. में भाढ़ान के राजा को परास्त किया और रेवाड़ी, भिवानी तथा अलवर के क्षेत्रों को अपने साम्राज्य में मिला लिया।
इस वंश के प्रमुख शासक थे : विग्रहराज प्रथम (734-759 ई.), गोविंद राज-प्रथम (809-836 ई.) विग्रहराज द्वितीय (971-988 ई.), विग्रहराज तृतीय 1070 – 1090 ई. विग्रह राज चतुर्थ (1050-1164 ई.) पृथ्वीराज चौहान 1178-1192 ई.
(स्रोत HBSE -6ठी कक्षा हरियाणा का इतिहास)
तरावड़ी की लड़ाई
तरावड़ी (करनाल) यानी तराईन यहां पर तीन महत्वपूर्ण युद्ध लड़े गए थे। पहला युद्ध 1191 ईस्वी में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच हुआ। जिसमें पृथ्वीराज चौहान विजय हुए। तथा दूसरा युद्ध भी 1192 ईस्वी में पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी के बीच हुआ। जिसमें मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान को धोखे से हराया था। मोहम्मद गौरी की मृत्यु 1206 ईस्वी में हुई थी।
पृथ्वीराज चौहान के दरबारी कवि चंदरबरदाई थे। चंदरबरदाई को पृथ्वी चंद भट्ट के के नाम से भी जाना जाता है। तराईन के युद्ध की जानकारी हमे चंदरबरदाई के द्वारा लिखी गयी पुस्तक पृथ्वीराज रासो से मिलती है।
तराईन का तीसरा युद्ध 1215-16 ईस्वी में इल्तुतमिश ने यल्दौज को पराजित किया था। इसके बाद गुलाम वंश की स्थापना होती है।
