वर्धन वंश (Vardhan Dynasty)

By Reacher

Updated on:

Follow us on Instagram

Follow Us

पुष्यभूति/वर्धन वंश के शासक

(स्रोत HBSE – 7वीं कक्षा हरियाणा का इतिहास)

नरवर्धन, राज्यवर्धन तथा आदित्यवर्धन (505 ई. – 580 ई.)

हर्षवर्धन के कवि बाणभट्ट की रचना से तथा बांसखेड़ा व मधुबन के तांम्रपत्र अभिलेखों से हमें जानकारी मिलती है कि नरवर्धन, राज्यवर्धन व आदित्यवर्धन इन तीनों शासकों ने 505 ई. से 580 ई. तक शासन किया। ये तीनों शासक पूर्णरूप से स्वतंत्र नहीं थे। इसी कारण उन्होंने ‘महाराज’ की उपाधि धारण की।

प्रभाकरवर्धन (580-605 ई.)

प्रभाकरवर्धन पुष्यभूति वंश का प्रथम स्वतंत्र शासक था। प्रभाकरवर्धन ने ‘महाराजाधिराज’ तथा ‘परमभट्टारक’ की उपाधियां धारण की। इन्होने 580 ई. से 605 ई. तक शासन किया। प्रभाकरवर्धन की तीन संतानें थी राज्यवर्धन, राज्यश्री तथा हर्षवर्धन।

बाणभट्ट ने उसकी प्रशंसा में हूणों के लिए ‘शेर’ तथा सिन्धु देश के लिए ‘ज्वर’ बताया है।

राज्यवर्धन (605 ई. – 606 ई.)

प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद 605 ई. में उसका बड़ा पुत्र राज्यवर्धन थानेसर के सिंहासन पर बैठा। इन्होने भी ‘महाराजाधिराज’ एवं ‘परमभट्टारक’ की उपाधियां धारण की। वह भी अपने पिता की भांति वीर एवं साहसी था। दूतों द्वारा यह दर्दनाक सूचना मिली कि मालवा के शासक देवगुप्त, गौड़ प्रदेश के राजा शशांक तथा वल्लभी के राजा ध्रुवसेन ने संयुक्त रूप से उसके बहनोई कन्नौज के शासक गृहवर्मा मौखरी के साथ युद्ध करके हत्या कर दी तथा उसकी बहन राज्यश्री को बंदी बना लिया।

इस संकट के समय राज्यवर्धन के छोटे भाई हर्षवर्धन ने भी उसके साथ जाने का आग्रह किया किंतु राज्यवर्धन ने यह कहते हुए इंकार कर दिया कि ‘हिरण का शिकार करने के लिए एक ही शेर पर्याप्त है।’ राज्यवर्धन ने इस युद्ध में साहस का परिचय देते हुए मालवा के शासक देवगुप्त को पराजित कर दिया परन्तु गौड़ प्रदेश के राजा शशांक ने धोखे से 606 ई. में राज्यवर्धन की हत्या कर दी।

हर्ष वर्धन (606 – 647 ई.)

जन्म : हर्षवर्धन का जन्म 4 जून 590 ई. को थानेश्वर के विशाल राज्य में हुआ।

हर्षवर्धन के जन्म के बाद कई दिनों तक समस्त राज्य में उत्सव मनाया गया था।

माता-पिता : हर्षवर्धन की माता का नाम यशोमति देवी तथा पिता का नाम प्रभाकरवर्धन था। हर्षवर्धन अपनी माता की भांति सहनशील तथा पिता की भांति साहसी एवं प्रतापी राजा था।

भाई एवं बहन : हर्षवर्धन तीन भाई-बहन थे सबसे बड़े भाई का नाम राज्यवर्धन व बड़ी बहन का नाम राज्यश्री था। हर्षवर्धन सबसे छोटे थे। हर्षवर्धन अपने भाई का बहुत आदर करता था तथा अपनी बहन से अथाह प्रेम करता था।

शिक्षा : हर्षवर्धन बहुत ही विद्वान एवं बुद्धिमान था जिससे यह अनुमान लगाया जाता है कि हर्षवर्धन की शिक्षा-दीक्षा का उचित ढंग से प्रबंध किया था।

शस्त्राभ्यास व युद्धाभ्यास : हर्षवर्धन का बचपन उनकी माता यशोमति के भतीजे ‘भंडी’ के साथ बीता था।

सम्राट हर्षवर्धन के राज्य की प्रथम राजधानी थानेसर (स्थाणेश्वर) सरस्वती नदी के किनारे स्थित थी और हर्ष का टीला पहले किला था जिसकी 5 बुर्जियां थी।

हेनसांग के अनुसार हर्षवर्धन ने अपने शासनकाल के प्रारंभिक 6 वर्ष (606 ई. से 612 ई. तक) पांच प्रदेशों के शासकों से लगातार युद्ध किया इन युद्धों के अंत में हर्ष की ही विजय हुई और हर्ष ने इन्हें अपने राज्य में मिला लिया। ये पांच राज्य पंजाब, कन्नौज, बिहार, बंगाल और उड़ीसा थे। इन विजयों से हर्ष की प्रतिष्ठा व कीर्ति बढ़ गई थी।

पुलकेशियन द्वितीय के साथ युद्ध : हर्षवर्धन उत्तर भारत का सबसे शक्तिशाली शासक था तो दूसरी ओर पुलकेशियन द्वितीय दक्षिणी भारत का शक्तिशाली शासक था। हर्ष की भांति ही वह भी एक महत्वाकांक्षी राजा था। हर्ष द्वारा वल्लभी पर विजय के बाद पुलकेशियन द्वितीय शंकित हो गया और युद्ध अनिवार्य हो गया था।

हर्ष ने पुलकेशियन का सामना करने के लिए पांच प्रदेशों से सेना एकत्र कर ली थी और 634 ई. में सेना के साथ हर्ष ने पुलकेशियन पर आक्रमण कर दिया। यह युद्ध नर्मदा नदी के किनारे पर हुआ। इस युद्ध में हर्ष की पराजय हुई।

हेनसांग का हर्ष के बारे में विवरण

हेनसांग एक चीनी यात्री था। इनको ‘यात्रियों का राजकुमार’ कहा जाता है। हेनसांग हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत आया तथा लगभग दस वर्षों तक हर्ष के दरबार में रहा। वह 629 ई. में भारत यात्रा के लिए चीन से चला। हेनसांग ने बौद्ध धर्म के तीर्थस्थानों व बौद्ध धर्म के बारे में जानने के लिए भारत आया था। ताशकंद, समरकंद तथा बल्ख से होता हुआ वह भारत के गांधार प्रदेश में पंहुचा। यहां से चलकर उसने पंजाब, कपिलवस्तु, गया, सारनाथ, श्रावस्ती, कुशीनगर आदि स्थानों की यात्रा की। उसने दो साल तक नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण की।

दक्षिण भारत में घूमने के बाद वह 644 ई. में चीन के लिए प्रस्थान कर गया। चीन पहुंचकर उसने अपनी भारत-यात्रा का वृत्तांत लिखा जिसका शीर्षक था- सी-यू-की (पश्चिमी देश का वृत्तांत)। यह ग्रंथ हर्ष कालीन भारत की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व धार्मिक स्थिति पर प्रकाश डालता है।

एहोल कर्नाटक के बीजापुर में स्थित बादामी के निकट, बहुत प्राचीन स्थान हैं यहां से पुलकेशियन द्वितीय का 634 ई. का एक अभिलेख प्राप्त हुआ है। इसका रचयिता जैन कवि रविकीर्ति था। इस अभिलेख में पुलकेशियन द्वितीय की विजय का वर्णन है। (स्रोत HBSE – 7वीं कक्षा हरियाणा का इतिहास)

नोट : हर्षवर्धन के समय चीनी यात्री हवेनसांग हरियाणा में 634 से 644 ईस्वी तक रहे थे। उनकी पुस्तक ‘सी यू की’ में थानेसर और कुरुक्षेत्र का वर्णन मिलता है। हर्षवर्धन के द्वारा लिखित पुस्तके प्रियदर्शिका, रत्नावली और नागानंद है। हर्ष का दरवारी कवि बाणभट्ट था जिसकी रचना – हर्षचरित्र और कादम्बरी थी।

Leave a Comment